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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 935 of 1416

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Page 935

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९०३

कफोदरवाला रोगी अजवायन, सेंधानमक, कालाजीरा, सोंठ, मिरच और पीपल इनके चूर्णको मिलाकर तक्र पान करे और त्रिदोषोत्पन्न उदररोगमें त्रिकुटा, जवाखार तथा सेंधानोन इनका चूर्ण डालकर तक्र पान करावे ॥ ७ ॥ ८ ॥

गौरवारोचकार्त्तानां समन्दाग्न्यतिसारिणाम् ।
तक्रं वातकफार्त्तानाममृतत्वाय कल्पते ॥ ९ ॥
वातोदरे पयोऽभ्यासो निरूहो दाशमुलिकः ।
सोऽदावर्त्ते वातघ्नाम्लशृतैरण्डानुवासनः ॥ १० ॥

शरीरमें भारीपन, अरुचि, मन्दाग्नि अतीसार आदि लक्षणोंसे आक्रान्त और वातकफसे पीडित रोगीको तक्रपान करना अमृतके समान उपकारी है। वातसे उत्पन्न उदररोगमें बल बढनेके लिये रोगीको दूध अधिक सेवन करावे । जब शरीर सबल होजाय तब दशमूलकी औषधियोंके क्वाथद्वारा निरूहबस्ति प्रयोग करे । उदावर्त्तयुक्त वातोदरमें वातनाशक और काँजी आदि अम्लद्रव्योंसे पकाये हुए अण्डीके तेलकी अनुवासनबस्ति प्रदान करे ॥ ९ ॥ १० ॥

स्नुकपयसा सह भाविततण्डुलचूर्णेन निर्मितः पूवः ।
उदरमुदारं हिंस्याद्योगोऽयं सप्तरात्रेण ॥ ११ ॥

थूहरके दूधमें चावलोंके चूर्णको पकाकर मालपुये बनावे । इन पुओंको सेवन करनेसे सातदिनमें ही अत्यन्त प्रबल उदररोग दूर होता है ॥ ११ ॥

सक्षीरं माहिषं मूत्रं निराहारः पिबेन्नरः ।
शाम्यत्यनेन जठरं सप्ताहादिति निश्चयः ॥ १२ ॥

प्रतिदिन प्रातःकाल समस्त अन्नजलादिका परित्याग करके भैंसके मूत्रको दूधमें मिलाकर पान करनेसे उदररोग एक सप्ताहमें निश्चय नाश होता है ॥ १२ ॥

मानमण्ड।

पुराणं मानकं पिष्ट्वा द्विगुणीकृततण्डुलम् ।
साधितं क्षीरतोयाभ्यामभ्यसेत्पायसं तु तत् ॥ १३ ॥
हन्ति वातोदरं शोथं ग्रहणीं पाण्डुतामपि ।
सिद्धो भिषग्भिराख्यातः प्रयोगोऽयं निरत्ययः ॥ १४ ॥

पुराने मानकन्दका चूर्ण एक भाग और चावल दो भाग लेवे। दोनोंको एकत्र पीसकर समान भाग दूध और जलके द्वारा पकावे। इस प्रकार सिद्ध की हुई खीरको सेवन करनेसे वातज उदररोग, सूजन, संग्रहणी, पाण्डु आदि रोग नष्ट होते हैं। इस खीरके सेवनमें अन्य सर्वप्रकारके भोजन त्याग देवे ॥ १३ ॥ १४ ॥