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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 932 of 1416

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Page 932

९०० भैषज्यरत्नावली । [ मेदोरोग-

पानाभ्यञ्जनगण्डूषनस्यवस्तिषु योजयेत् ।
स्थूलतालस्यकण्ड्वादीन् जयेत्कफकृतान् गदान् ॥ ४१ ॥
त्रिफला, अतीस, मुर्वा, निसोत, चीता, अडूसा, नीमकी छाल, अमळतासकी
छाल, वच, सतवन, हल्दी, दारुहलदी, गिलोय, निर्गुण्डी, पीपल, कूठ, सरसों और
सोंठ इनके समान भाग मिले एक सेर कल्कके द्वारा सुरसादिगणकी औषधियोंके
क्वाथमें तिलके तेलको यथाविधि धीरे धीरे सिद्ध करे । इस तेलको पान, अभ्यंग
गण्डूष, नस्य और वस्तिकर्ममें प्रयोग करना चाहिये । यह तेल स्थूलता, आलस्य,
खुजली आदिरोग एवं कफजनित सम्पूर्ण रोगोंको हरता है ॥
मेदोरोगमें पथ्य ।
चिन्ता श्रमो जागरणं व्यवायः प्रोद्वर्त्तनं लङ्घनमात-
पश्च । हस्त्यश्वयानं भ्रमणं विरेकः प्रच्छर्दनं चाप्यपतर्प-
णानि ॥ ४२ ॥ पुरातना वैणवकोरदूषश्यामाकनीवार-
प्रियङ्गवश्च । यवाः कुलत्थाश्चणका मसूरा मुद्गास्तुवर्या-
ऽपि मधूनि लाजाः ॥ ४३ ॥ कटूनि तिक्तानि कषाय-
काणि तक्रं सुरा चिङ्गटमत्स्य एव । दग्धानि वार्त्ताकु-
फलानि चापि फलत्रयं गुग्गुलु वायसश्च ॥४४॥ कटुत्रयं
सार्षपतैलमेला रूक्षाणि सर्वाणि च मुख्यतैलम् । पत्रोत्थ-
शाकोऽगुरुलेपनानि प्रतप्तनीराणि शिलाजतूनि ॥
प्राग्भोजनस्यापि च वारिपानं मेदोगदं पथ्यमिदं निहन्ति ॥
चिन्ता, अत्यन्त परिश्रम, रात्रिमें जागना, मैथुन, शरीरपर जोरसे उबटन करना,
लङ्घन, धूपका सेवन, हाथी और घोडे आदिकी सवारीपर चढना, भ्रमण करना,
जुल्लाब लेना, वमन और अपतर्पण करना, पुराने बाँसीके चावल, कोदों, सामा,
नीवार और कँगुनीके चावल, जौ, कुलथी, चने, मसूर, मूँग, अरहर, शहद, खीलें,
चरपरे, कडवे और कषायरसवाले पदार्थोंका भोजन, मट्ठा, मदिरा, चिङ्गटमत्स्य
( मछली विशेष ), बैँगनोंका भूर्त्ता, त्रिफला, गुगल, राल, त्रिकुटा, सरसोंका तेल,
इलायची, सम्पूर्ण रूक्ष पदार्थ, तिलका तेल, पत्रशाक, अगरका लैप, उष्ण जलसे
स्नान, पान, शिलाजीत सेवन और भोजन करनेसे पूर्व जलका पीना ये सब मेदरो-
गमें हितकारक पदार्थ हैं । इनके सेवन करनेसे उक्त रोग शीघ्र नष्ट होता
है ॥ ४२-४५ ॥