भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८८७
अत्यन्त तेजवान् यह सोमेश्वररस सोमरोग, एकदोषज, द्विदोषण, अत्युग्र सान्निपातिक और अनेक उपद्रवोंसे युक्त, बहुत पुराना मूत्राघात, मूत्रकृच्छ्र, कामला, हलीमक, भगन्दर, उपदंश, नाना प्रकारकी पीडाजनक व्रण, फोडे, अर्बुदरोग, कण्डू ( खुजली ), सर्वप्रकारके प्रमेह, यकृत, प्लीहा, उदररोग, गुल्म, शूल, अर्श, खाँसी, विद्रधि और चिरकालोत्पन्न सोमरोगादि कष्टोंको तत्क्षण नष्ट करता है तथा बल, कान्ति और जठराग्निको उत्पन्न करता हैं और इससे ग्रहपीडा भी दूर होती है। इसमें बकरीका दूध, नारियलका जल, पकाया हुआ शीतल तेल और जौका यूष प्रभृति अनुपानोंको दोषानुसार प्रयोग करे। यह रस सब दोषोंको नष्ट करनेवाला है ॥ ३४-३९ ॥
बहुमूत्रान्तकरस १-२ ।
रसश्च शाल्मलीमूलचूर्णं कद्लिमूलजम् ।
उडुम्बरबीजचूर्णं लौहं वङ्गं च विद्रुमम् ॥ ४० ॥
मुक्ताऽहिफेनसारी च प्रत्येकं समभागिकम् ।
मर्दयेन्मालती पुष्परसेन कुशलो भिषक् ॥ ४१ ॥
रक्तिद्वयमितां कुर्याद्वटिकामतिशोभनाम् ।
बहुमूत्रान्तको नाम रसः परमशोभनः ॥
मधुमेहं सोमरोगं हन्ति भास्वान् यथा तमः ॥ ४२ ॥
१-रससिन्दूर, सेमलकी मुसलीका चूर्ण, केलेकी मूलका चूर्ण, गूलरके बीजोंका चूर्ण, लोहा, वङ्ग, मूगा, मोती और अफीम ये प्रत्येक द्रव्य समान भाग लेवे। सबको एकत्र मालतीके फूलोंके स्वरसमें अच्छे प्रकार खरल करके दो दो रत्तीकी उत्तम गोलियाँ तैयार करलेवे। यह अत्यन्त सुन्दर बहुमूत्रान्तकनामवाला रस मधुमेह और सोमरोगको इस प्रकार नष्ट करता है, जिस प्रकार सूर्य अपनी प्रखर किरणोंसे अन्धेरेको दूर करदेता है ॥ ४०-४२ ॥
सिन्दूरं च तथा लौहं वङ्गाहिफेनसारकौ ।
उडुम्बरभवं बीजं बिल्वमूलं सुरप्रिया ॥ ४३ ॥
सर्वं समं जन्तुफलरसैः सम्मर्दितं भवेत् ।
रक्तिद्वयमितां खादेद्वटिकामनुपानतः ॥ ४४ ॥
दद्यादौदुम्बरफलरसं पथ्यविधिं शृणु ।
मांसप्रधानं भक्ष्यं च तथा गोधूमपिष्टकम् ।
बहुमूत्रान्तकरसो नाशयेदविकल्पतः ॥ ४५ ॥