भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८८१
कमल और नीलकमलका कन्द ( भसींडा ), कमलगट्टा, खजूर, कलिहारी, ताडका माथा, त्रिकुटा तेन्दूके फल, खैर, इन्द्रजौ एवं सम्पूर्ण कडुवे और कषैले रसवाले पदार्थ, हाथी और घोडेपर सवार होकर भ्रमण करना, धूपका सेवन और व्यायाम ( दण्ड-कसरत आदि परिश्रम ) करना ये सब खाद्य, औषधें तथा क्रियायें प्रमेहरोगियोंके विशेष हितकारी हैं ॥ ६६-१७० ॥
प्रमेहमें अपथ्य ।
मूत्रवेगं धूमपानं स्वेदं शोणितमोक्षणम् ।
सदाऽऽसनं दिवानिद्रां नवान्नानि दधीनि च ॥ ७१ ॥
आनूपमांसं निष्पावं पिष्टान्नानि च मैथुनम् ।
सौवीरकं सुरां शुक्तं तैलं क्षीरं घृतं गुडम् ॥ ७२ ॥
तुम्बीं तालास्थिमज्जानं विरुद्धान्यशनानि च ।
कूष्माण्डमिक्षुं दुष्टाम्बु स्वाद्वम्ललवणानि च ॥
अभिष्यन्दीनि यत्नेन प्रमेही परिवर्जयेत् ॥ १७३ ॥
मूत्रके वेगको रोकना, धूमपान, स्वेदप्रदान, रुधिर निकलवाना, हरवख्त बैठें रहना, दिनमें शयन करना, नये अन्न, दही, अनूपदेशके प्राणियोंका मांसरस, सेमकी फली, पिट्ठीके पदार्थ, मैथुन, करना, सौवीरनामक काँजी, मद्य, सिरका, तेल, दूध, घी, गुड, लौकी, ताड़की गिरी, प्रकृतिविरुद्ध भोजन, पेठा, ईखका रस दूषित जल एवं मधुर, खट्टे, नमकीन और कफको बढानेवाले इत्यादि समस्त पदार्थोंको प्रमेहरोगी सप्रयत्न तत्काल त्यागदेवे । क्योंकि ये सब अत्यन्त हानि-कर हैं ॥ ७१-१७३ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां प्रमेहचिकित्सा ॥
सोमरोगकी चिकित्सा ।
स्त्रीणामतिप्रसङ्गाद्वा शोकाद्वापि श्रमादपि ।
आभिचारिकदोषाच्च गरदोषात्तथैव च ॥ १ ॥
आपः सर्वशरीरेभ्यः क्षुभ्यन्ति प्रस्रवन्ति च ।
तस्मात्ताः प्रच्युताः स्थानान्मूत्रमार्गं व्रजन्ति च ॥
प्रसन्ना विमलाः शीता निर्गन्धा नीरुजः सिताः ॥ २ ॥
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