भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context| ८६४ | भैषज्यरत्नावली । | [ प्रमेह- |
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शुद्ध पारेकी भस्म, कान्तलोहकी भस्म, शिलाजीत, सोनामाखी, मैनसिल, सोंठ, मिर्च, पीपल, त्रिफला, बेलागिरी, जीरा, कैथ और हल्दी इन औषधियोंको समान भाग लेकर कूटपीसकर चूर्ण करलेवे। पश्चात् इस चूर्णको भाङ्गेके रसमें तीस बार भावना देकर सुखा लेवे। तदनन्तर नित्यप्रति प्रातःकाल इस चूर्णको एक एक तोला परिमाण शहदमें मिलाकर सेवन करे। ऊपरसे बकायनके बीजोंका चूर्ण २४ माशे लेकर चार तोले चावलोंके धोवनमें पीसे। फिर उसमें ८ माशे गोघृत डाल-कर पान करे तो यह मेहवज्ररस बहुत पुराने प्रमेहों तथा दारुण मूत्रकृच्छ्रादि रोगोंको अल्पकालमें दूर करता है ॥ ५६ ॥
चन्द्रप्रभावटिका ।
वेल्लव्योषफलत्रिकं त्रिलवणं द्विक्षारचव्यानल-
श्यामापिप्पलिमूलमुस्तक शठीमाक्षीकधातुत्वचः ।
षड्ग्रन्थामरदारुवारणकणाभूनिम्ब्दन्ती निशा-
पत्रैलातिविषाः पिचुप्रतिमिता लौहस्य कर्षाष्टकम् ॥ ५७ ॥
त्वक्क्षीरी पलिका पुराद्दश पलान्यष्टौ शिलाजन्मनो
मानात्कर्षसमा कृतेति गुडिका संयोज्य सर्वे भिषक् ।
तत्रैव प्रतिवासरं सह घृतक्षौद्रेण लिह्यादिमां
तक्रं मस्तु च गोघृतं मधुरसं पश्चात्पिबेन्मात्रया ॥ ५८ ॥
वायविडङ्ग, सोंठ, मिरच, पीपल, त्रिफला, सेंधानमक, कालानमक, विडनमक, जवाखार, सज्जी, चव्य, चीता, कालीसर, पीपलामूल, नागरमोथा, कचूर, सोना-माखी, दारचीनी, वच, देवदारु, गजपीपल, चिरायता, दन्ती, हल्दी, पत्रज, इलायची और अतीस ये प्रत्येक औषधि दो दो तोले और लोहभस्म १६ तोले, वंशलोचन ४ तोले, शुद्ध गूगल ४० तोले एवं शिलाजीत ३२ तोले लेवे। इन सबको एकत्र बारीक कूटपीसकर जलमें खरल करके दो दो तोलेकी गोलियाँ बनालेवे। इस वटीको प्रतिदिन प्रातःसमय घृत और शहदमें मिलाकर सेवन करे। इसपर मट्ठा, दहीका तोड, गौका घी और मधु इनमेंसे किसी एकको उचित मात्रासे सेवन करे तो इससे प्रमेह और मूत्रकृच्छ्ररोग नष्ट होते हैं ॥ ५७ ॥ ५८ ॥
चन्द्रप्रभावटी ।
चन्द्रप्रभावचामुस्ताभूनिम्बसुरदारवः ।
हरिद्राऽतिविषा दार्वी पिप्पलीमूलचित्रकम् ॥ ५९ ॥