भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context४५८ | भैषज्यरत्नावली । | [ प्रमेह -
क्षियोंके मांसरसके साथ भोजन करे। इसको प्रतिदिन प्रातःसमय एक एक तोला सेवन करे और जब सौ पल परिमाण औषधि भक्षण करचुके तब छोडदेवे। यह औषधि मधुमेहको छोडकर अन्य सर्वप्रकारके प्रमेहरोग, शर्करा और पथरीरोगको नष्ट करती है। इसका सेवन करनेवाला रोगी आरोग्य होकर और आयु, बल, वर्ण करके युक्त सौ वर्षपर्यन्त जीता है॥
कुशावलेह।
कुशः काशो वीरणश्च कृष्णेक्षुः खग्गडस्तथा।
एषां दशपलान्भागान्जलद्रोणे विपाचयेत् ॥ २२ ॥
अष्टभागावशेषं तु कषायमवतारयेत् ।
खण्डप्रस्थं समादाय लेहवत्साधु साधयेत् ॥ २३ ॥
अवतार्य ततः पश्चाच्चूर्णानीमानि दापयेत् ।
मधुकं कर्कटीबीजं कर्कारु त्रपुषं तथा ॥ २४ ॥
शुभामलकपत्राणि त्वगेला नागकेशरम् ।
वरुणाऽमृता प्रियंगू प्रत्येकमक्षसम्मितम् ॥ २५ ॥
कुशा, काँस, खस, कालीईख और खग्गड (तृण विशेष) इन सबकी मूलकों चालीस चालीस तोले लेकर एक द्रोण जलमें पकावे। पकते पकते जब आठवाँ भाग जल शेष रहे तब उतारकर छानलेवे। फिर इस क्वाथमें एक प्रस्थ उत्तम खाँड डालकर विधिपूर्वक पाक करे। जब अवलेहकी समान होजाय तब चूल्हेपरसे उतारकर उसमें मुलहठी, ककडीके बीज, पेठेके बीज, खीरेके बीज, वंशलोचन, आमले, तेजपात, दारचीनी, नागकेशर, वरनाकी छाल, गिलोय और फूलप्रियंगू ये प्रत्येक दो दो तोले चूर्ण करके डालदेवे।। सबको एकत्र मिलाकर उत्तम चिकने पात्रमें भरकर रखदेवे ॥ २२-२५ ॥
प्रमेहान्विंशतिं हन्ति मूत्राघातांस्तथाऽश्मरीम् ।
वातिकान्पैत्तिकांश्चापि श्लैष्मिकान्सान्निपातिकान् ॥
हन्त्यरोचकमत्युग्रं बलपुष्टिकरं परम् ॥ २६ ॥
यह अवलेह नित्यप्रति उचित मात्रासे सेवन करनेसे बीसों प्रकारके प्रमेह, मूत्राघात, अश्मरी, वातज, पित्तज, कफात्मक और सन्निपातज विकार और अत्युग्र अरुचिको शीघ्र नष्ट करता है। एवं शरीरमें अत्यन्त बलकी वृद्धि तथा पुष्टि करता है ॥ २६ ॥