भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context५६ भैषज्यरत्नावली। [ चिकित्सा-
कायफल, नागरमोथा, वच, पाठ, पोहकरमूल, कालाजीरा, पित्तपापडा, काकडासिंगी, इन्द्रजौ, धनियाँ, कचूर, भाँगरा, पीपल, कुटकी, हरड, सुगन्धवाला, चिरायता, भारङ्गी, हींग, खिरेंटी, दशमूल और पीपलामूल इनका उत्तम प्रकारसे क्वाथ बनाकर उसमें हींग और अदरखका रस डालकर पान करनेसे सन्निपातज्वर, गलगण्ड, गण्डमाला, स्वरभंग, गलेके रोग, कानकी जडमें उत्पन्नहुई सूजन, ठोडी व मुखके रोग, कफवातज्वर, खाँसी, शिरोरोग, शिरका भारीपन, कफ और वातसे उत्पन्नहुई बधिरता ये सब रोग नष्ट होते हैं ॥ ३००-३०३ ॥
वाताधिक्यसन्निपातज्वरकी चिकित्सा ।
बृहत्पञ्चमूलक्वाथ ।
पञ्चमूलीकषायं च दद्याद्वातोत्तरे ज्वरे ।
भृशोष्णं वा सुखोष्णं वा दृष्ट्वादोषबलाबलम् ॥ ४ ॥
वाताधिक्यसन्निपातज्वरमें दोषोंके बलाबलको विचारकर अत्यन्त उष्ण वा मन्दोष्ण ( सुहाता २ ) बृहत्पञ्चमूलका क्वाथ पान करना चाहिये ॥ ४ ॥
कट्फलादि ।
कट्फलाब्दवचापाठापुष्कराजाजिपर्पटैः ।
देवदार्वभयाशृङ्गीकणाभूनिम्बनागरैः ॥ ५ ॥
भाङ्गीकलिङ्गकटुकाकत्तृणशठीकत्तृणधान्यकैः ।
समांशैः साधितः क्वाथो हिङ्ग्वार्द्रकरसैर्युतः ॥ ६ ॥
कर्णमूलोद्भवं शोथं हन्ति मन्यागलाश्रयम् ।
कफवातज्वरं श्वासं कासं हिक्कां हनुग्रहम् ॥ ७ ॥
गलगण्डं गण्डमालां स्वरभेदं कफात्मकम् ।
शिरोगुरुत्वं बाधिर्यं वृद्धिं च कफमेदसोः ॥ ८ ॥
कायफल, नागरमोथा, वच, पाठ, पोहकरमूल, कालाजीरा, पित्तपापडा, देवदारु, हरड, काकडासिंगी, पीपल, चिरायता, सोंठ, भारंगी, इन्द्रजौ, कुटकी, कचूर, गन्धेजघास और धनियाँ इन समानभागमिश्रित औषधियोंका क्वाथ बनाकर उसमें हींग और अदरखका रस मिलाकर सेवन करनेसे कानकी जडकी सूजन, मन्यास्तम्भ, गलेके रोग, कफवातज्वर, श्वास, खाँसी, हिचकी, हनुग्रह, गलगण्ड, गण्डमाला, कफजन्य स्वरभेद, शिरका भारीपन, बधिरता, कफ और मेदकी वृद्धि दूर होती है ॥ ५-८ ॥