भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context८४२ | भैषज्यरत्नावली । | [ अश्मरी-
मूत्राघातमें अपथ्य ।
विरुद्धानि च सर्वाणि व्यायामं मार्गशीलनम् ।
रूक्षं विदाहि विष्टम्भि व्यवायं वेगधारणम् ॥
करीरं वमनं चापि मूत्राघाती विवर्जयेत् ॥ १६ ॥
सर्व प्रकारके विरुद्ध भोजन, व्यायाम (कसरत आदि), रास्ता चलना, रूखे, दाहकारक और विष्टम्भकारक द्रव्योंका सेवन, स्त्रीप्रसङ्ग, मल मूत्रादिके वेगको धारण करना, बाँसके अंकुरोंको भक्षण करना और वमन करना इन समस्त पदार्थों व क्रियाओंको मूत्राघातवाला रोगी शीघ्र छोडदेवे ॥ १६ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां मूत्राघातचिकित्सा ।
अश्मरीकी चिकित्सा ।
सगुडो वरुणक्वाथस्तत्कल्केनाथवाऽन्वितः ।
शिग्रूक्वाथोथवाऽत्युष्णो हन्त्याशु सरुगश्मरीम् ॥ १ ॥
वरनाकी छालके क्वाथ या कल्कके साथ गुड मिलाकर सेवन करे अथवा सहिंजनेकी जडका गरम गरम क्वाथ पान करे तो पीडासहित अश्मरीरोग शीघ्र नष्ट होता है ॥ १ ॥
त्रिकण्टकस्य बीजानां चूर्णं माक्षिकसंयुतम् ।
अजाक्षीरेण सप्ताहं पेयमश्मरिभेदनम् ॥ २ ॥
गोखुरूके बीजोंके चूर्णको शहद और बकरीके दूधके साथ मिलाकर एक सप्ताह पर्यन्त सेवन करनेसे पथरी नष्ट होती है ॥ २ ॥
प्रपिबेत्तालमूल्या वा कल्कं व्युषितवारिणा ।
तेनैवाथ गवाक्ष्या वा त्र्यहादश्मरिपातनम् ॥ ३ ॥
मुसली अथवा इन्द्रायनकी जडके चूर्णको बासी जलमें पीसकर पीवे तो तीन दिनमें पथरी गलकर निकल पडती है ॥ ३ ॥
यो नारिकेलकुसुमं सक्षारं वारिणा पिष्ट्वा ।
पिबति हि तस्य दिनैकान्निपतति घोराऽश्मरी नूनम् ॥४॥
यदि नारियलके पुष्प और जवाखारको जलमें पीसकर पीवे तो दारुण पथरी एक दिनमेंही निश्चय छिन्नाभिन्न होकर निकल जाती है ॥ ४ ॥