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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 870 of 1416

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Page 870
८३८भैषज्यरत्नावली ।[ मूत्रकृच्छ्र-

२-शुद्ध पारा, गन्धक, सुवर्ण और वैक्रान्तमणि सबको बराबर २ लेकर लिंगिनीलता और चोरनामक गन्धद्रव्य ( भटेडर ) के रसमें दो प्रहरतक विधिपूर्वक खरल करके गोलासा बनालेवे । फिर इस गोलेको सुखालेवे और महापुटमें स्थापनकर सन्धिस्थानोंको बन्द करके उपलोंकी अग्निमें एक दिनतक पुट देवे । जब शीतल होजाय तब निकालकर चूर्ण कर लेवे । इसमेंसे प्रतिदिन एकएक माशा, शहदमें मिलाकर चाटे तो मूत्रकृच्छ्र शान्त होता है ॥ ३१ ॥ ३२ ॥

शतावरीघृत और क्षीर ।

शतावरीकाशकुशश्वदंष्ट्राविदारिकेक्ष्वामलकेषु सिद्धम् ।
सर्पिःपयो वा सितया विमिश्रं कृच्छ्रेषु पित्तप्रभवेषु योज्यम् ३३

शतावर, काँस, कुश, गोखुरू, विदारीकन्द, ईख और आमले इनके क्वाथमें सिद्ध कियाहुआ घृत अथवा दूध मिश्री डालकर पान करे तो पित्तज मूत्रकृच्छ्र दूर होता है ॥ ३३ ॥

त्रिकण्टकाद्य घृत ।

त्रिकण्टकैरण्डकुशाद्यभीरुकर्कारुकेक्षुस्वरसेन सिद्धम् ।
सर्पिर्गुडाद्धर्द्धांशयुतं प्रपेयं कृच्छ्राश्मरीमूत्रविघातहेतोः ॥३४॥

गोखुरू, अण्डकी जड, कुशादि पञ्चमूल, शतावर, पेठा और ईख इनके स्वरस ( अभावमें क्वाथ ) से सिद्ध कियाहुआ घी और घीसे आधा भाग गुड मिलाकर पीवै । इस घृतके सेवन करनेसे मूत्रकृच्छ्र, पथरी और मूत्राघात रोग शीघ्र नष्ट होते हैं ॥ ३४ ॥

मूत्रकृच्छ्रमें पथ्य ।

पुरातना लोहितशालयश्च क्षारो यवान्नानि च तीक्ष्णमुष्णम् ।
तक्रं पयो दध्यपि गोप्रसूतं धन्वामिषं मुद्गरसाः सिता च ॥ ३५ ॥
पुराणकूष्माण्डफलं पटोलं महार्द्रकं गोक्षुरकं कुमारी ।
गुवाकखर्जूरकनारिकेलतालद्रुमाणां च शिरांसि पथ्या ॥ ३६ ॥
तालास्थिमज्जा त्रपुषं त्रुटिश्च शीतानि पानान्यशनानि चापि ।
प्रणीरनीरं हिमवालुका च हितं नृणां स्यात्प्रतिमूत्रकृच्छ्रे ॥३७॥

पुराने लाल शालिके चावल, जवाखार आदि खार द्रव्य, जौका भोजन, तीक्ष्ण और गरम पदार्थ, मठा, गौका दूध, दही, मरुदेशके जीवोंका मांस