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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 86 of 1416

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Page 86

५४ भैषज्यरत्नावली । [ चिकित्सा-


मुस्तादिगण ।

मुस्तपर्पटकोशीरदेवदारुमहौषधम् ।
त्रिफलाधन्वयासश्च नीली कम्पिल्लकस्त्रिवृत् ॥ ९२ ॥
किराततिक्तकं पाठा बला कटुकरोहिणी
मधुकं पिप्पलीमूलं मुस्ताद्यो गण उच्यते ॥ ९३ ॥
अष्टादशाङ्गमुदितमेतद्वा सन्निपातनुत् ।
पित्तोत्तरे सन्निपाते हितं चोक्तं मनीषिभिः ॥
मन्यास्तम्भ उरोघाते उरःपार्श्वशिरोग्रहे ॥ ९४ ॥

नागरमोथा, पित्तपापडा, खस, देवदारु, सोंठ, त्रिफला, धमासा, नील, कबीला, निसोध, चिरायता, पाठ, खिरेंटी, कुटकी, मुलहटी और पीपलामूल इनको मुस्तादि-गण कहते हैं और अष्टादशाङ्ग भी कहते हैं । इसका क्वाथ सेवन करनेसे सन्निपात-ज्वर नष्ट होता है । एवं पित्ताधिक्य सन्निपातज्वर, मन्यानाडीका जकडजाना, उरोघात, हृदय और पसलीकी पीडा और शिरकी पीडामें यह क्वाथ विशेष उपयोगी है॥९२-९४॥

द्वात्रिंशाङ्ग ।

भाङ्गींभूनिम्बनिम्बा।घनकटुकवचा।व्योषवासा।विशाला-
रास्नानन्तापतोलीसुरतरुरजनीपाटला तिन्दुकैश्च ।
ब्राह्मीदा।र्वीगुडूचीत्रिवृतमतिविषापुष्करात्रायमाणै-
र्व्याघ्रीसिंहीकलिङ्गैस्त्रिफलशठियुतैः कल्पितस्तुल्यभागैः ॥
क्वाथो द्वात्रिंशनामा त्रिभिरधिकदशान् सन्निपातान्निहन्ति
शूलं कासादिहिक्का श्वसनगदरुजाध्मानविध्वंसकारी॥ ९५ ॥

भारंगी, चिरायता, नीमकी छाल, नागरमोथा, कुटकी वच, सोंठ, मिरच, पीपल, अडूसा, इन्द्रायनकी जड, रासन, अनन्तमूल, परवल, देवदारु, हल्दी, पाढल, तेन्दु, ब्राह्मी, दारुहल्दी, गिलोय, निसोध, अतीस, पोहकरमूल, त्रायमाण, कटेरी, बडीकटेरी, इन्द्रजौ, हरड, बहेडा, आमला और कचुर इसको द्वात्रिंशाङ्ग क्वाथ कहते हैं । सब ओषधियोंको समानभाग लेकर यथाविधि क्वाथ बनाकर प्रयोग करे । यह क्वाथ तेरह प्रकारके सन्निपातज्वर, शूल, खाँसी, हिचकी, श्वास और आध्मान आदि संपूर्ण रोगोंको नष्ट करता है ॥ ९५ ॥