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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 843 of 1416

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Page 843

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८११


त्रिफलारसमूत्रेण नियच्छेत्सांन्निपातिकम् ।
रक्तगुल्मं च नारीणामुष्ट्रीक्षीरेण पाययेत् ॥ ५९ ॥

इनमेंसे एक या दो अथवा तीन गोली नित्यप्रति प्रातःसमय कुछ गरम जल, काँजी, मदिरा, मांसका यूष, घृत अथवा दूधके साथ भक्षण करे । कांकायन ऋषि की कही हुई यह गुडिका गुल्म, अर्श, हृदयरोग और कृमिरोगोंको नष्ट करनेवाली है । यह वटी गोमूत्रके साथ सेवन करनेसे बहुत पुराने कफगुल्मको, दूधके साथ पित्तके गुल्मको एवं मदिरा या काँजीके साथ वातजन्यगुल्मको, त्रिफलेके क्वाथ या गोमूत्रके साथ सन्निपातजनितगुल्मको और ऊँटनीके दूधके साथ सेवन करनेसे स्त्रियों के रक्तगुल्मरोगको शमन करती है ॥ ५६–५९ ॥

पञ्चाननरस ।

पारदं शिखिचुत्थं च गन्धं जैपालपिप्पली ।
आरग्वधफलान्मज्जा वज्रीक्षीरेण भावयेत् ॥ ६० ॥
धात्रीरसयुतं खादेद्रक्तगुल्मप्रशान्तये ।
चिञ्चादलरसं चानु पथ्यं दध्योदनं हितम् ॥ ६१ ॥

पारा, नीलाथोथा, शुद्ध गन्धक, जमालघोटा, पीपल और अमलतासका गूदा ये सब द्रव्य समान भाग लेकर थूहरके दूधमें खरल करे । इसको प्रतिदिन दो दो रत्ती की मात्रासे आमलोंके रसमें मिलाकर सेवन करे और ऊपरसे इमलीके पत्तोंका स्वरस पान करे । इसपर दही और भात मिलाकर भक्षण करे । इस रसके सेवन करनेसे स्त्रियोंका रक्तगुल्म शीघ्र नष्ट होता है ॥ ६० ॥ ६१ ॥

शिखिवाड़वरस ।

मारितं ताम्रसूताभ्रं गन्धकं माक्षिकं समम् ।
मर्दयेच्चित्रकद्रावैर्यवक्षारयुतं दिनम् ॥ ६२ ॥
द्विगुञ्जं भक्षयेन्नित्यं नागवल्लीदलेन च ।
वातगुल्महरः ख्यातो रसोऽयं शिखिवाड़वः ॥ ६३ ॥

ताम्रभस्म, पारदभस्म, अभ्रकभस्म, शुद्ध गन्धक, सोनामाखी और जवाखार ये सब समान भाग लेवे । फिर सबको चीतेके रसमें एक दिनतक खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । नित्यप्रति एक गोली पानके रसके साथ सेवन करे । यह शिखिवाड़वनामवाला रस वातगुल्मरोगको बहुत जल्द खोदेता है ॥ ६२ ॥ ६३ ॥