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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 80 of 1416

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Page 80

४८ | भैषज्यरत्नावली । | [ चिकित्सा-


अर्कमूलं बृहत्सिंही श्रेयसी सदुरालभा ।
दीप्यकश्चाजमोदा च शुकनासः सहिंगुका ॥ ५८ ॥
एतानि समभागानि गण एकोऽष्टविंशतिः ।
एषां क्वाथो निपीतः स्याद्वातश्लेष्मज्वरापहः ॥ ५९ ॥
हन्ति वातं तथा शीतं प्रस्वेदमतिवेपथुम् ।
प्रलापं चातिनिद्रां च रोमहर्षारुची तथा ॥ २६० ॥
महावातेऽपतन्त्रे च शूले च सर्वगात्रजे ।
पिप्पल्यादिमहाक्वाथो ज्वरे सर्वत्र पूजितः ॥ ६१ ॥

पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीता, सोंठ, वच, अतीस, कालाजीरा, पाठ, इन्द्रजौ, रेणुका, चिरायता, मूर्वा ( चुरनहार ), सरसों, काली मिरच, कायफल, पोहकरमूल, भारंगी, वायविडंग, काकडासिंगी, आककी जड, बडी कटेरी, रायसन, धमासा, अजवायन, अजमोद, अरलू और हींग इन समान भाग मिली हुई २८ औषधियोंको बृहत् पिप्पल्यादिगण कहते हैं । इसका क्वाथ पान करनेसे वातश्लैष्मिक ज्वर तथा वात, शीत पसीनेका अधिक आना, शरीरमें कम्प होना, प्रलाप, निद्राकी अधिकता रोमाञ्च होना और अरुचि आदि समस्त उपद्रव नष्ट होते हैं । इस बृहत्पिप्पल्यादि क्वाथको महावात, अपतन्त्रक, समस्त शरीरगत शूल और सर्वप्रकारके ज्वरोंमें प्रयोग करना श्रेष्ठ है ॥ ५६-२६१ ॥

किरातादिक्वाथ ।

किरातविश्वामृतवह्निसिंही-
कणाकणामूलरसोनसिन्दुकैः ।
कृतः कषायो विनिहन्ति शीघ्रं
ज्वरं सवातं सकफात्समुत्थितम् ॥ ६२ ॥

चिरायता, सोंठ, गिलोय, बडी कटेरी, पीपल, पीपलामूल, लहसुन और सिम्हालू, इनका क्वाथ बनाकर सेवन करनेसे दोषोंका परिपाक होता है और वातकफज्वर शीघ्र नष्ट होता है ॥ ६२ ॥

सन्निपातज्वरकी चिकित्सा ।

लंघनाद्युपचार ।

लंघनं वालुकास्वेदो नस्यं निष्ठीवनं तथा ।
अवलेहोऽञ्जनं चैव प्राक् प्रयोज्यं त्रिदोषजे ॥ ६३ ॥