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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 725 of 1416

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Page 725

'चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६९३


कफजकोपविनाशकृतेऽनलवमननावनरूक्षनिषेवणम् ॥ ७ ॥

कफके कोपके शमन करनेके लिये अग्निका सेवन, वमन करना, नस्य देना और रूक्ष पदार्थोंका सेवन करना चाहिये ॥ ७ ॥

विविधः सुरतानन्दः संश्रमः कफवारणः ।
कटुक्षाराम्लकाः सेव्याः शोधनं कफसम्भवे ॥ ८ ॥

कफजनित रोगोंमें—स्त्रीसहवास, परिश्रम, चरपरे, खारी और अम्ल (खट्टे) रसवाले पदार्थोंका सेवन और वमन, विरेचनादिके द्वारा शरीरकी शुद्धि करना ये सब कफनाशक हैं ॥ ८ ॥

कफचिन्तामणिरस ।

हिङ्गुलेन्द्रयवं टङ्कं त्रैलोक्यबीजमेव च ।
मरिचं च समं सर्वं त्रिभागं रससिन्दुरम् ॥ ९ ॥
आर्द्रकस्य रसेनैव मर्दयेद्याममात्रकम् ।
चणकाभा वटी कार्या सर्ववातप्रशान्तये ॥
कफरोगं निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥ १० ॥

सिंगरफ, इन्द्रजौ, सुहागा, भाँगके बीज और कालीमिरच ये प्रत्येक एक एक भाग और रससिन्दूर, तीन भाग लेकर सबको एकत्र अदरखके रसके साथ एक प्रहरतक खरल करे, फिर चनेकी बराबर गोलियाँ बनाकर सर्वप्रकारके वातरोगोंके शमन करनेके लिये सेवन करावे। यह रस कफरोगोंको इस प्रकार शीघ्र नाश कर देता है, जैसे सूर्य अन्धकारको नष्ट करता है ॥ ९ ॥ १० ॥

बृहत्कफकेतुरस ।

मुक्तासुवर्णे च समानभागे प्रवालभस्मापि तयोः समानम् ।
अभ्रं च योज्यं द्विगुणं प्रवालात्स्वर्णोत्थसिन्दुरसमं विकल्प्य॥
दुग्धेन नार्या विमलाशमपात्रे यत्नेन मर्द्यं कुशलैर्भिषग्भिः ।
गुञ्जात्रयं चास्य कफप्रकोपे सेवेत सद्यः कफनाशमिच्छन् ११

मोती १ तोला, सुवर्ण १ तोला, मूँगाभस्म २ तोले, अभ्रकभस्म ४ तोले और स्वर्णसिन्दूर, ८ तोले लेवे। इन सबको साफ़ पत्थरके खरलमें डालकर स्त्रीके दूधके साथ उत्तम प्रकारसे खरल करे। कफका प्रकोप होनेपर शीघ्र कफनाश करने की इच्छावाला मनुष्य इस रसको प्रतिदिन तीन तीन रत्ती प्रमाण सेवन करे ॥११॥