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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 717 of 1416

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Page 717

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६८५


प्रागुक्तौ शुद्धिसंस्कारौ गन्धानामिह तैः पुनः ।
लक्ष्मीविलासो द्विगुणैः स्यादयं तैलसत्तमः ॥ ४९ ॥
पञ्चपत्राम्बुना चाद्यो द्वितीयो गन्धवारिणा ।
तृतीयोऽपि च तेनैव पाको वा धूपिताम्बुना ॥ ५० ॥
तैलयुग्ममिदं तूर्णं विकारान्‍वातसम्भवान् ।
क्षपयेज्जनयेत्पुष्टिं कान्तिं मेधांधृतिं धियम् ॥ ५१ ॥

मंजीठ, चोरपुष्पी (भटेउर), देवदारु, धूपसरल, व्याघ्रनख, वच, सुपारीके पेडकी छाल, तेजपात, सुगन्धतृण, कचूर, हरड, आमले, बहेडा और नागरमोथा इन पन्द्रह औषधियोंको दो दो पल लेकर कूट पीसकर कल्क बनावे । इस कल्क और बिल्वादि पञ्चपल्लवके गन्धोदक (क्वाथ) के साथ एक प्रस्थ तिलके तैलको प्रथमवार पकावे । फिर बालछड, कपूरकचरी, मैनफल, चम्पाके फूल, फूलप्रियंगु, दारचीनी, गठिवन, सुगन्धवाला, कूठ, मरुएके फूल और असवरंग ये प्रत्येक दो दो पल एवं गन्धबिरोजा, कुन्दुरु, नखी, नलिका और सौंफ इन प्रत्येकके एक एक पल कल्कको डालकर और महाराजप्रसारणी तैलमें कहेहुए गन्धोदकके साथ दूसरा पाक करे । फिर इलायची, लौंग, शिलारस, चन्दन, चमेलीके फूल, खट्टासमुष्क शीतलचीनी, अगर, लताकस्तूरी और केशर ये प्रत्येक दो दो तोले, कस्तूरी २ तोले और कपूर छः मासे दो रत्ती इन दो औषधियोंके कल्कके साथ इस महासुगन्धितैलको मन्दमन्द अग्निके द्वारा तीसरीवार पकावे । इसमें कस्तूरी ५ भाग और कपूर आधा लेवे । कपूर और कस्तूरीसे आधे पत्र कल्कको बारीक पीसकर सुगन्ध बढानेके लिये तैलको पकाकर छानलेनेपर गरममें ही मिलादेवे । गन्धद्रव्योंके शुद्धि और संस्कार पहले कहचुके हैं, उन्हींके द्वारा इसमेंभी व्यवहार करे । कल्क द्रव्योंको दुगुनी मात्रासे इस तैलमें डालनेसे यह ही सर्वोत्तम लक्ष्मीविलास तैल हो जाता है । प्रथमपाक पञ्चपल्लवके क्वाथके साथ, दूसरा पाक गन्धोदकके साथ, तीसरापाक अगरके द्वारा धूपितकियेहुए गन्धजलके साथ करना । यह दोनों प्रकारका तैल वातजनित सम्पूर्ण विकारोंको शीघ्र नष्ट करता है । एवं पुष्टि, कान्ति, मेधा, धृति और बुद्धिको उत्पन्न करता है ॥ ४४-५१ ॥

वातव्याधिमें पथ्य ।

अभ्यङ्गो मर्दनं वस्तिः स्नेहः स्वेदोऽवगाहनम् ।
संवाहनं संशमनं प्रावृतिर्वातवर्जनम् ॥ ५२ ॥