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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 711 of 1416

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Page 711

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६७९

दशमूल्यश्वगन्धे च नागपुष्पं रसाञ्जनम् ।
कटुकाजातिपूगानां फलानि शल्लकीरसम् ॥ ११ ॥
भागांस्त्रिपलिकान्दत्त्वा शनैर्मृद्वग्निना पचेत् ।
विस्तीर्णे सुदृढे पात्रे पाच्यैषा तु प्रसारणी ॥ १२ ॥

अब कल्ककी ओषधियोंको कहते हैं—भिलावे, तगर, सोंठ, पीपल, चीता, कचूर, वच, असवरग, प्रसारणी, पीपलामूल, देवदारु, सोया, छोटी इलायची, दारचीनी, सुगन्धवाला, केशर, कस्तूरी, मंजीठ, शिलारस, नख, अगर, कपूर, कुन्दुरु, हल्दी, लौंग, सुगन्ध, तृण, रक्तचन्दन, शीतल, चीनी, नलिका, नागरमोथा, काली अगर, कुमुद, तेजपात, कचूर, रेणुका, भूरिछरीला, गन्धाबिरोजा, केवडा, त्रिफला, कौंच, शतावर, धूपसरल, कमलकी केशर, फूलप्रियंगु, खस, बालछड, जीवकादिगणकी औषधियाँ, पुनर्नवा, दशमूल, असगन्ध, नागकेशर, रसौंत, कुटकी जायफल, सुपारी, सेमलकी मुषली और सालइका गोंद इन प्रत्येकके कल्कको बारह बारह तोले डालकर सबको एक बहुत बडे और दृढ पात्रमें भरकर इस प्रसारणीतैलको मन्दमन्द अग्निद्वारा शनैः शनै पकाना चाहिये । ( बडे बर्त्तनके अभावमें प्रत्येक ओषधिका अलग अलग क्वाथ पकावे ) ॥ ६–४१२ ॥

प्रयोगः षड्विधश्चात्र रोगार्त्तानां विधीयते ।
अभ्यङ्गात्त्वग्गतं हन्ति पानात्कोष्ठगतं तथा ॥ १३ ॥
भोजनात्सूक्ष्मनाडीस्थान्नस्यादूर्ध्वगतं तथा ।
पक्वाशयगते वस्तिर्निरूहः सर्वकायिके ॥ १४ ॥

यह तैल वातपीडित रोगियोंको छः प्रकारसे सेवन करावे । इसको मालिश करने से त्वचागत, वातरोग, पान करनेसे कोष्ठगत, वात, भोजन करनेसे सूक्ष्मनाडियोंमें स्थित वात, नस्य, देनेसे ऊर्ध्व अर्थात् शिरोगत वायु, वस्तिक्रिया ( पिचकारी लगाने ) से पक्वाशयगत वात, और निरूहवास्तिद्वारा प्रयोग करनेसे समस्त शरीरगत वातकी पीडा नाश होती है ॥ १३ ॥ १४ ॥

एतद्धि वडवाश्वानां किशोराणां यथाऽमृतम् ।
एतदेव मनुष्याणां कुञ्जराणां गवामपि ॥ १५ ॥