Skip to content
SarvaKosh
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 709 of 1416

Read in context
Page 709

चिकित्सा ] भाषाटीकासहितः । ६७७

लिये असवरग, काकडासिङ्गी, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीर-
काकोली, ऋद्धि, वृद्धि, मुगवन, मषवन, जीवन्ती, मुलहठी, मंजीठ, काकोली, कौंचकी
जड, छोटी इलायची, कपूर, कुन्दरू, धूपसरल, केशर, बालछड, नख, कालीअगर,
कुमुद पद्माख, हल्दी, शीतलचीनी, गंठिवन, नागकेशर, खस, दारचीनी, सुपारी
(किसी २ के मतसे सुपारीके वृक्षकी छाल लेनी ), कुटकी, जायफल, शतावर,
गन्धबिरोजा, देवदारु, लालचन्दन, वच, भूरिछरीला, सेंधानमक, शिलारस, नागर-
मोथा, प्रसारणीकी जड, नलिका, पुनर्नवा, चोरक, कस्तूरी, दशमूल, केतकीकी जड,
तगर, सुगन्धित, तृण, असगन्ध, सुगन्धवाला, रेणुका, रसौंत, सेमलकी जड, मैन-
फल, अगर, श्यामालता, सोया, कूठ, भिलावे, त्रिफला, कमलकी केशर, कालिसर,
लौङ्ग और त्रिकुटा इन सबको तीन तीन पल लेकर कल्क करके डालदेवे। फिर
सबको एक बहुत बडे पात्रमें भरकर मन्दमन्द अग्निद्वारा तेलको पकावे ॥ ९६-९९॥

पानाभ्यञ्जनवस्तिनस्यविधिना तन्मारुतं नाशयेत्
सर्वाङ्गाङ्गतं तथाऽवयवगं सन्ध्यस्थिमज्जाश्रितम् ।
श्लेष्मोत्थानकपैत्तिकांश्च शमयेन्नानाविधानामयान्
धातून् बृंहयति स्थिरं च कुरुते पुंसां नवं यौवनम् ॥४००॥
वृद्धस्यापि बलं करोति सुमहद्वन्ध्यासु गर्भप्रदं
पीत्वा तैलमिदं जरन्त्यपि सुतं सूतेऽधुना भूरुहाः ।
सिक्ताः शोषमुपागताश्च फलिनः स्निग्धा भवन्ति स्थिरा
भग्नाङ्गाः सुदृढा भवंति मनुजा गावो हयाः कुञ्जराः॥१॥

इस तेलको पान और मालिश कराना, वस्तिक्रिया (पिचकारी लगाना), नस्य
देना आदि क्रियाओंद्वारा सेवन करानेसे वातरोग नाश होता है। यह तैल सम्पूर्ण
अङ्ग, अर्द्धाङ्ग व एकाङ्गमें स्थित वातकी पीडा एवं सन्धि, अस्थि और मज्जागत वात-
व्याधि, कफजन्य और पित्तजन्य नानाप्रकारके रोगोंको शमन करता है। एवं धातु-
ओंको पुष्ट, स्थिर और मनुष्योंके नवयौवनको स्थिर करता है। वृद्ध मनुष्यको भी
अत्यन्त बलवान् करनेवाला और वन्ध्यास्त्रियोंको गर्भप्रदान करनेवाला है। इस
तेलके पान करनेसे बुढापेमेंभी स्त्री पुत्रको उत्पन्न करती है। सूखे हुए वृक्षोंको इस
तेलके द्वारा सींचनेसे वे फिर हरे भरे, फल फूल युक्त स्निग्ध और मजबूत होजाते
हैं। टूटगये हैं अंग जिनके ऐसे मनुष्य, गौयें, घोडे और हाथी इस तेलके सेवनसे
अत्यन्त दृढ अंगवाले होते हैं ॥ ४०० ॥ १ ॥