Skip to content
SarvaKosh
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 702 of 1416

Read in context
Page 702

६७० | भैषज्यरत्नावली । | [ वातव्याधि-


औषध है । इस तैलको पान, बस्तिकर्म, मर्दन, नस्य आदि कार्योंमें एवं कानों और आँखोंमें भरना आदि क्रियाओं द्वारा व्यवहार करे । यह सर्वप्रकारके वातरोगोंको नष्ट करनेवाला है ॥ ५१–५३ ॥

निरामिषमहामाषतैल ।

दशमूलाढकं पक्त्वा जलद्रोणेऽङ्घ्रिशेषिते ।
तद्वन्माषाढकक्वाथे तैलप्रस्थं पयःसमे ॥ ५४ ॥
कल्केरेतैश्च मतिमान् साधयेन्मृदुनाऽग्निना ।
अश्वगन्धा शठी दारु बला रास्ना प्रसारिणी ॥ ५५ ॥
कुष्ठं परूषकं भार्गी द्वे विदार्यौ पुनर्नवा ।
मातुलुङ्गफलाजाज्यौ रामठं शतपुष्पिका ॥ ५६ ॥
शतावरी गोक्षुरकं पिप्पलीमूलचित्रकौ ।
जीवनीयगणं सर्वं सहृत्यैव ससैन्धवम् ॥ ५७ ॥
तत्साधु सिद्धं विज्ञाय माषतैलमिदं महत् ।
वस्त्यभ्यञ्जनपानेषु नावने च प्रशस्यते ॥ ५८ ॥

एक आढक परिणाम दशमूलको एक द्रोण जलमें पकाकर चौथाई भाग जल शेष रहनेपर उतारकर छानलेवे । इसी प्रकार एक आढक उडदोंका क्वाथ सिद्धकर दोनोंको एकत्र मिलालेवे । फिर उसमें तिलका तैल १ प्रस्थ, दूध ४ प्रस्थ एवं असगन्ध, कचूर, देवदारु, खिरैंटी, रायसन, प्रसारिणी, कूठ, फालसे, भारंगी, विदारीकन्द, क्षीरविदारी, पुनर्नवा, बिजौरानींबू, जीरा, कालाजीरा, हींग, सोया, शतावर, गोखुरू, पीपलामूल, चीतेकी जड, जीवनीयगणकी सब औषधियाँ और सैंधानमक इन सबके समान भाग मिलित कल्कको तैलसे चौथाई भाग डालकर यथाविधि तैलको पकावे । जब उत्तम प्रकारसे पककर सिद्ध होजाय तब इस महामाष तैलको बस्तिक्रिया, अभ्यञ्जन ( मालिश करना ), पान करना और नस्य देना इन क्रियाओं द्वारा प्रयोग करना चाहिये ॥ ५४–५८ ॥

पक्षाघाते हनुस्तम्भे अर्दिते सापतन्त्रके ।
अपबाहुकविश्वाच्योः खांज्यपाङ्गुल्ययोरपि ॥ ५९ ॥
शिरोमन्याग्रहे चैव अधिमन्थे च वातिके ।
शुक्रक्षये कर्णनादे कर्णक्ष्वेडे च दारुणे ।
कलायखञ्जशमने भैषज्यमिदमादिशेत् ॥ ३६० ॥