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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 699 of 1416

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Page 699

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६६७

मन्दश्रुतौ चाश्रवणे तिमिरे च त्रिदोषजे ।
हस्तकम्पे शिरःकम्पे विश्वाच्यामपबाहुके ॥ ३७ ॥
शस्तंकलायखञ्जे च पानाभ्यञ्जनवस्तिभिः ।
माषतैलमिदं श्रेष्ठमूर्ध्वजत्रुगदापहम् ॥ ३८ ॥
उत्तम उड़दोंको १ प्रस्थ लेकर एक आढ़क जलमें पकावे । जब पककर चौथाई भाग जल शेष रह जाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उस क्वाथमें दूध ४ प्रस्थ, तिलका तैल १ प्रस्थ एवं जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, ऋद्धि, वृद्धि, सोया, सेंधानमक, रास्ना, कौंचके बीज, मुलहठी, खिरेंटी, त्रिकुटा और गोखुरू इन सब औषधियोंके कल्कको दो दो तोले डालकर विधिपूर्वक उत्तम प्रकारसे तैलको सिद्ध करे । इस तैलको पान, अभ्यञ्जन ( मालिश ) और वस्तिक्रियाद्वारा पक्षाघात, अर्दितवात, दारुण कानकी पीडा, श्रवणशक्तिका ह्रास, बहरापन, त्रिदोष-जन्य नेत्ररोग, हस्तकम्प, शिरःकम्प, विश्वाची, अपबाहुक और कलायखञ्ज इन सब वातरोगोंमें प्रयोग करना चाहिये । यह माषतैल ऊर्ध्वजत्रुरोगको दूर करनेके लिये अत्युत्तम है ॥ ३४-३८ ॥

बृहन्माषतैल ।

माषातसीयवकुरुण्टककण्टकारीगोकण्टटुण्टुकजटाकपि-
कच्छुतोयैः । कार्पासकास्थिशणबीजकुलत्थकोल-
क्वाथेन बस्तपिशितस्य रसेन चापि ॥ ३९ ॥ शुण्ठ्या
समागधिकया शतपुष्पया च सैरण्डमूलसपुनर्नवया
सरण्या । रास्नाबलामृतलताकटुकैर्विपक्वं माषाख्यमेत-
दपबाहुहरं च तैलम् ॥ ४० ॥ अर्द्धाङ्गशोषमपतानक-
माढ्यवातमाक्षेपकं सभुजकम्पशिरःप्रकम्पम् । नस्येन
वस्तिविधिना परिषेचनेन हन्यात्कटीजघनजानुरुजश्च
सर्वाः ॥ ४१ ॥

उड़द, अलसी, जौ, पियाबाँसकी जड, कटेरी, गोखरू, शोनापाठेकी जडकी छाल, बालछड, कौंचके बीज, कपासके बीज ( बिनौले ), सनके बीज, कुलथी और सूखे बेर इन प्रत्येकके क्वाथ और बकरेके मांसरसके साथ सोंठ, पीपल, सोया, अण्डकी जड, पुनर्नवा, प्रसारिणी, रास्ना, खिरेंटी, गिलोय और कुटकी इन औषधियोंके