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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

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Page 69

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ३७

हरड, बहेडा, आमला, परवल, अडूसा, गिलोय, कुटकी और वच इनके क्वाथको अथवा दशमूल और अडूसेके क्वाथको शहदके साथ पान करनेसे कफ-ज्वर दूर होता है ॥ ९७ ॥

मुस्ताद ।

मुस्तं वत्सकबीजानि त्रिफला कटुरोहिणी ।
परूषकाणि च क्वाथः कफज्वरविनाशनः ॥ ९८ ॥

नागरमोथा, इन्द्रजौ, हरड, बहेडा आमला, कुटकी और फालसे इनका क्वाथ कफज्वरनाशक है ॥ ९८ ॥

कटुत्रिकादि ।

कटुत्रिकं नागपुष्पं हरिद्रा कटुरोहिणी ।
कौटजं च फलं हन्यात्सेव्यमानं कफज्वरम् ॥ ९९ ॥

सोंठ, मिरच, पीपल, नागकेशर, हल्दी, कुटकी और इन्द्रजौ इनका क्वाथ सेवन करनेसे कफज्वर नष्ट होता है ॥ ९९ ॥

पिप्पल्यादिगण ।

पिप्पली पिप्पलीमूलं मरिचं गजपिप्पली ।
नागरं चित्रकं चव्यं रेणुकैलाऽजमोदिका ॥ २०० ॥
सर्षपो हिङ्गु भार्गी च पाठेन्द्रयवजीरकाः ।
महानिम्बं वचा मूर्वा विषा तिक्ता विडङ्गकम् ॥ १ ॥
पिप्पल्यादिगणो ह्येष कफमारुतनाशनः ।
गुल्मशूलज्वरहरो दीपनस्त्वामपाचनः ॥ २ ॥

पीपल, पीपलामूल, मिरच, गजपीपल, सोंठ, चीता, चव्य, रेणुका, इलायची, अजमोद, सरसों, हींग, भारङ्गी, पाठ, इन्द्रजौ, जीरा, बकायन, वच, मूर्वा, अतीस, कुटकी और वायविडङ्ग यह पिप्पल्यादि गण है । यह कफ, वात, गुल्म, शूल और ज्वरको नष्ट करता है । अग्निको दीपन और आमको पचाता है । इसका कफज्वरमें यथाविधि क्वाथ बनाकर विशेष रूपसे सेवन करना चाहिये ॥ २००–२ ॥

सारिवादि ।

सारिवाऽतिविषाकुष्ठपुरारूख्यैः सदुरालभैः ।
मुस्तेन च कृतः क्वाथः पीतो हन्यात्कफज्वरम् ॥ ३ ॥