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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

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Page 684
६५२भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

जड, पोईका शाक और फरहदकी छाल इन सबको दसदस पल लेकर एकएक द्रोणपरिमाण जलमें पकाकर चतुर्थांश जल शेष रहनेपर उतारकर छानलेवे । फिर सबको एकत्र मिलाकर उसमें तिलका तैल १ आढक एवं असगन्ध, चोरपुष्पी, पद्माख, कटेरी, खिरेंटी, अगर, नागरमोथा, रोहिषतृण, शिलारस, अगर, लालचन्दन, सफेदचन्दन, त्रिफला, मूर्वा, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, मुगवन, मषवन, जीवन्ती, मुलहठी, त्रिकुटा, रोहिषतृण, केशर, कस्तूरी, दारचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर, भूरिछरीला, नख, मोथा, कमलनाल, नीलकमल, खसकी जड, जटामांसी, मुरामांसी, देवदारु, वच, अनार, तुम्बुरु, ऋद्धि, वृद्धि, दौना और छोटी इलायची इन प्रत्येक ओषधिके दो दो तोले कल्कको डालकर मन्दमन्द अग्निके द्वारा उत्तम प्रकारसे तैलको पकावे ॥ २७-३३ ॥

एतत्तैलवरं हन्ति वातपित्तकफोद्भवान् ।
व्याधीनशेषाञ्जनयेत्स्मृतिं मेधां धृतिं धियम् ॥ ३४ ॥
वातरोगान्विशेषेण प्रमेहान् हन्ति विंशतिम् ।
गर्भं संस्थापयेत्स्त्रीणां सर्वं शूलं व्यपोहति ॥
मूत्रकृच्छ्रमपस्मारमुन्मादान्निखिलानपि ॥ ३५ ॥
स्थविरोऽपि जराजीर्णस्तैलस्यास्य निषेवणात् ।
लीलया प्रमदानां च उन्मदानां शतं जयेत् ॥ ३६ ॥
तिष्ठेद्यस्य गृहे तैलं श्रीगोपालाभिधंशुभम् ।
न तत्र भूताः सर्पन्ति न पिशाचा न राक्षसाः ॥ ३७ ॥
न दारिद्र्यं भवेत्तस्य विघ्नः कश्चिन्न जायते ।
अश्विभ्यां निर्मितं ह्येतद्विश्वकल्याणहेतवे ॥ ३८ ॥

यह उत्तम तैल मर्दन करनेसे वात, पित्त और कफसे उत्पन्न हुई सम्पूर्ण व्याधियोंको शीघ्र नष्ट करता है । एवं स्मरणशक्ति, मेधा, धैर्य और बुद्धिको उत्पन्न करता है । विशेषकर वातरोग और बीसों प्रकारके प्रमेहोंको दूर करता है और स्त्रियोंके गर्भको स्थापन करता है । सर्व प्रकारके शूलरोग, मूत्रकृच्छ्र, अपस्मार और सर्वप्रकारके उन्मादरोगोंको नाश करता है । जिसका देह वृद्धावस्थाके द्वारा जीर्ण होगया हो ऐसा वृद्ध मनुष्यभी इस तैलको सेवन करनेसे सैकड़ों उन्मत्त स्त्रियोंको सहजही जीत सकता है । जिसके घरमें यह श्रीगोपालनामक तैल रहता है वहाँ भूत, पिशाच और राक्षस कभी नहीं प्रवेश करते ।