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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

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Page 680
६४८भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

कुष्ठमेला देवदारु शैलजं सैन्धवं वचा ।
कक्कोलं पद्मकाष्ठं च शृङ्गी तगरपादिका ॥ ६ ॥
गुडूची मुद्रपर्णी च माषपर्णी शतावरी ।
नागजिह्वा श्यामलता शतपुष्पा पुनर्नवा ॥
एषां तोलद्वयं भागं दत्त्वा तैलं तु पाचयेत् ॥ ७ ॥

खिरेंटी १०० पल और दशमूल १०० पल लेकर दोनोंको पृथक् पृथक् सोलह-गुने जलमें पकावे । जब चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर इस क्वाथमें तिलका तेल ३२ पल और कल्कके लिये मंजीठ, लालचन्दन, कूठ, इलायची, देवदारु, भुरिछरीला, सैंधानमक, वच, शीतलचीनी, पद्माख, काकड़ासिंगी, तगर, गिलोय, मुगवन, मषवन, शतावर, अनन्तमूल, सारिवा, सोया और पुनर्नवा इन प्रत्येकक दो दो तोल चूर्णको डालकर विधिपूर्वक तैलको पकावे ॥ ४-७ ॥

एतत्तैलवरं नाम्ना वायुच्छायासुरेन्द्रकम् ।
सर्ववातविकारेषु हितं पुंसां च योषिताम् ॥ ८ ॥
क्षीणशुक्रार्त्तवानां च नारीणां च विशेषतः ।
चेतोविकारं हन्त्याशु वातमाक्षेपसम्भवम् ॥ ९ ॥
मर्म्मवातं श्रमकृतं गात्रकम्पादिकं तथा ।
हिक्कां श्वासं च कासं च वातपित्तसमुद्भवम् ॥२१०॥
अपस्मारे महोन्मादे हितं लेपे च भक्षणे
श्रीमद्गहननाथेन रचितं विश्वसम्पदे ॥२११॥

यह वायुच्छायासुरेन्द्रनामक श्रेष्ठ तैल सर्व प्रकारक वातरोगोंमें हितकारी है । विशेषकर क्षीणवीर्यवाले पुरुषों और क्षीणरजवाली स्त्रियोंके लिये अत्यन्त उपकारी है । एवं मानसिकविकार, वातजन्य आक्षेपरोग, मर्मगत वात, श्रमजनित वात, शरीरमें कम्प होना, हिक्कारोग और वातपित्तजन्य श्वास, कासरोगको शीघ्र नष्ट करताहै । अपस्मार और प्रबल उन्माद रोगमें इस तेलको मर्दन और भक्षण करनेसे विशेष उपकार होताहै । इसको संसारके कल्याणके लिये श्रीगहननाथजीने रचा है ॥ ८-२११ ॥