भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
Public domain in India · Report a copyright issue
Page 677 of 1416
Read in contextचिकित्सा | भाषाटीकासहिता । | ६४६
आनाहेऽर्शोविकारेषु चातुर्थिकज्वरेऽपि च ।
हनुग्रहे तथा शोषे क्षीणे चैवापबाहुके ॥ ८५ ॥
दण्डापतानके भग्ने दाहे चाक्षेपके तथा ।
जीर्णज्वरे विषे कुष्ठे शेफःस्तम्भे मदात्यये ॥ ८६ ॥
आढ्यवातेऽग्निमान्द्ये च वातरक्तगदेषु च ।
एकाङ्गरोगिणे चैव तथा सर्वाङ्गरोगिणे ॥ ८७ ॥
हस्तकम्पे शिरःकम्पे जिह्वास्तम्भे ज्वरे भ्रमे ।
क्षीणेन्द्रिये नष्टशुके शुक्रनिस्सरणे तथा ॥ ८८ ॥
स्त्रीणां वातास्रपाते च पटले चाक्षिस्पन्दने ।
एकाङ्गस्पन्दने चैव सर्वाङ्गस्पन्दने तथा ॥ ८९ ॥
नगादिपतिते वाते स्त्रीणामप्राप्तिहेतुके ।
आभिचारिकदोषे च मनस्सन्तापसम्भवे ॥ १९० ॥
यह घृत सर्व प्रकारके वातरोग, विशेषकर अपस्मार, उन्माद, पक्षाघात, आध्मान, कोष्ठबद्धता, कर्णरोग, शिरोरोग, बधिरताँ, अपतन्त्रक, भूतोन्माद, गृध्रसी, उदररोग, नेत्ररोग, पार्श्वशूल, हृदयशूल, बाह्यायाम, अर्दित, वातकण्टक, हृदयरोग मूत्रकृच्छ्र, पंगुता, क्रोष्टुशीर्ष, खञ्जवात, कुब्जवात, गद्गदवात मिनमिनवात, अपतानक, अन्तरायाम, ऊर्ध्वगत रक्तपित्त, अफारा, बवासीर, चौथिया ज्वर, हनुग्रह, शोष, क्षीणता, अपबाहुक, दण्डापतानक, भग्नरोग, दाह आक्षेप, जीर्णज्वर, विषविकार, कोढ, लिंगस्तम्भ, मदात्यय, आढ्यवात, अग्निकी मन्दता, वातरक्त, एकांगवात, सर्वांगवात, हस्तकम्प, शिरःकम्प, जिह्वाकी जडता, ज्वर, भ्रम, इन्द्रियोंकी क्षीणता, वीर्यकी हीनता शुक्रपात, स्त्रियोंके वातके द्वारा रक्तस्राव होना, पटलगत नेत्ररोग, आँख फडकना, एक अंग व सम्पूर्ण अंगोंका स्पन्दन (फडकना), वृक्ष-पर्वतादिकें ऊपरसे गिरनेसे उत्पन्न हुई वात, स्त्रियोंकी अप्राप्तिके कारण उत्पन्न हुई वात, अभिचारक दोष और मनके सन्तापसे उत्पन्न हुई वातव्याधिमें सेवन करना चाहिये ॥ ८४-१९० ॥
ये वातप्रभवा रोगा ये च पित्तसमुद्भवाः ।
शिरोमध्यगता ये च जङ्घापार्श्वादिसंस्थिताः ॥ ९१ ॥
मातृग्रहाभिभूतश्च शिशुर्यश्च विशुष्यति ।
प्रक्षीणबलमांसश्च न वर्त्मगमनक्षमः ॥ ९२ ॥