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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 645 of 1416

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Page 645

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६१३

दोनों पञ्चमूल, त्रिफला, हल्दी, दारुहल्दी, कुडेकी छाल, सतवन, चिरंचिटा, नील, कुटकी, अमलतास, कठूमरकी जड, पोहकरमूल, और धमासा इन प्रत्येक ओषधिको आठ आठ तोले लेकर एक द्रोण जलमें पकावे । जब पककर चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे ॥ २७ ॥ २८ ॥

भाङ्गीं पाठां त्रिकटुकं त्रिवृतां निचुलानि च ।
श्रेयसीमाढकीं मूर्वी दन्तीं भूनिम्बाचित्रकौ ॥
द्वे शारिवे रौहिषं च भूतिकां मदयन्तिकाम् ॥ २९ ॥
क्षिपेत्पिष्ट्वाऽक्षमात्राणि तैः प्रस्थं सर्पिषः पचेत् ।
गोशकृद्रसदध्यम्लक्ष्ीरमूतैश्च तत्समैः ॥
पञ्चगव्यमिदं ख्यातं महत्तदमृतोपमम् ॥ ३० ॥

फिर उसमें भारङ्गी, पाठ, त्रिकुटा, निसोत, जलबेंत, गजपीपल, अरहर, मूर्वा, दन्ती, चिरायता, चीता, कालीसर, गौरीसर, रोहिषतृण, अंजवायन और मोतिया के फूल इन प्रत्येकका कल्क दो दो तोले एवं गौका घी, गोबरका रस, खट्टा दही, दूध और गोमूत्र ये प्रत्येक एक एक प्रस्थ डालकर उत्तम प्रकारसे घृतको पकावे ॥ २९ ॥ ३० ॥

अपस्मारे ज्वरे कासे श्वयथावुदरे तथा ॥ ३१ ॥
गुल्मार्शःपाण्डुरोगेषु कामलायां हलीमके ।
अलक्ष्मीग्रहरक्षोघ्नं चातुर्थिकविनाशनम् ॥ ३२ ॥

यह बृहतपञ्चगव्यनामक घृत अपस्मार, ज्वर, खाँसी, शोथ, उदररोग, गुल्म, अर्श, पाण्डुरोग, कामला और हलीमकादि रोगोंमें अमृतकी समान हितकर है । एवं दारिद्य, ग्रहबाधा, राक्षसबाधा, और चातुर्थिकज्वर को दूर करता है ॥ ३१ ॥ ३२ ॥

महाचैतसघृत ।

शणस्त्रिवृत्तथैरण्डो दशमूली शतावरी ।
रास्ना मागधिका शिग्रुः क्वाथ्यं द्विपलिकं भवेत् ॥ ३३ ॥
विदारी मधुकं मेदे द्वे काकोल्यौ सिता तथा ।
एभिः खर्जूरमृद्वीकाभीरुमुञ्चातगोक्षुरैः ।
चैतसस्य घृतस्याङ्गे पक्तव्यं सर्पिरुत्तमम् ॥ ३४ ॥

सनके बीज, निसोत, अण्डकी जड, दशमूल, शतावरं, रायसन, पीपल और सहिंजना इन प्रत्येक ओषधिको आठ आठ तोले लेकर क्वाथ बनालेवे । फिर उस