भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
Public domain in India · Report a copyright issue
Page 636 of 1416
Read in context६०४ भैषज्यरत्नावली । [ उन्माद-
"घृतप्रस्थोऽत्र पक्तव्यः क्वाथो द्रोणाम्भसा घृतात् ।
चतुर्गुणोऽत्र सम्पाद्यः कल्कः कल्याणकेरितः" ॥६६॥
कुम्भीरको छोड़कर दोनों पञ्चमूलकी अन्य सब ओषधियाँ, रायसन, अण्डकी जड, निसोत, खिरेंटी, मूर्वा और शतावर इन प्रत्येकको आठ आठ तोले लेकर एक द्रोण जलमें पकावे, चौथाई जल शेष रहजानेपर उतारकर छान लेवे। फिर उस क्वाथमें पानीयकल्याणघृतकी सब ओषधियोंका कल्क और घृतको डालकर पकावे। इसको कल्याणकघृतका अङ्ग होनेसे चैतसघृत कहते हैं। यह घृत सर्वप्रकारके मन के विकारोंको शमन करता है। इसको छः छः माशेकी मात्रासे उष्ण दुग्धके साथ सेवन करना चाहिये। "इसमें घी एक प्रस्थ लेना चाहिये, एक द्रोण जल में क्वाथ करे और घीसे चौगुना कल्याण घृतकी ओषधियोंका कल्क डालना चाहिये" ॥ ६४-६६ ॥
महापैशाचिकघृत ।
जटिला पूतना केशी चारटी मर्कटी वचा ।
त्रायमाणा जया वीरा चोरकः कटुरोहिणी ॥ ६७ ॥
कायस्था शूकरीच्छत्रा सातिच्छत्रा पलंकषा ।
महापुरुषद्न्ता च वयःस्था नाकुलीद्वयम् ॥ ६८ ॥
कटम्भरा वृश्चिकाली स्थिरा चैव शृतं घृतम् ।
चातुर्थिकज्वरोन्मादग्रहापस्मारनाशनम् ॥ ६९ ॥
महापैशाचिकं नाम घृतमेतद्यथाऽमृतम् ।
मेधाबुद्धिस्मृतिकरं बालानां चाङ्गवर्द्धनम् ॥ ७० ॥
बालछड, हरड, भूतकेशी, भुईंआमला, कौंचके बीज, वच, त्रायमाण, अरणी, क्षीरकाकोली, चोरपुष्पी, कुटकी, आमले, वाराहीकन्द, सौंफ, छोटा गोखरू, बडी शतावर, ब्राह्मी, रास्ना, गन्धरास्ना, गन्धप्रसारणी, बिछाटी घास और शालपर्णी इन सबके समान भाग मिश्रित कल्क और चौगुने जलके साथ यथाविधि घृतको सिद्ध करे। यह महापैशाचिकनामक घृत चौथियाज्वर, उन्माद, ग्रहबाधा और अपस्मारको नष्ट करनेके लिये अमृतकी समान है। एवं मेधा, बुद्धि, स्मरणशक्ति और बालकोंके अङ्गोंकी वृद्धि करनेवाला है ॥ ६७-७०
शिवाघृत ।
शिवायास्तु सुपूतायाः पञ्चाशत्पलात्पलम् ।
पञ्चपञ्च समादाय पञ्चमूलीयुगात्पृथक् ॥ ७१ ॥