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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 634 of 1416

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Page 634
६०२भैषज्यरत्नावली ।[ उन्माद-

रस, विषांबिल, बिजौरानींबूका रस, अदरखका रस, अनारका रस, मदिरा, दहीका तोड और अम्लकाँजी ये प्रत्येक पदार्थ आधा आधा प्रस्थ एवं हरड, बहेडा, आमला, देवदारु, सेंधानमक, त्रिकुटा, अजमोद, अजवायन, चव्य, हींग, और अमलवेत इनके कल्कको दो-दो तोले डालकर यथाविधि घृतको पकावे। इस प्रकार सिद्ध कियेहुए इस घृतको यथोचित मात्रासे सेवन करनेसे शूल, गुल्म, अर्श, मन्दाग्नि, ब्रध्न, पाण्डु, प्लीहा, योनिरोग, कृमिरोग, ज्वर, वात-कफजन्य रोग, उन्माद और अन्य सर्वप्रकारके रोग दूर होते हैं ॥ ४९-५३ ॥

पानीयकल्याणकघृत ।

विशाला त्रिफला कौन्ती देवदार्त्वेलवालुकम् ।
स्थिरा नतं हरिद्रे द्वे शारिवे द्वे प्रियङ्गुकम् ॥ ५४ ॥
नीलोत्पलैलामञ्जिष्ठा दन्ती दाडिमकेशरम् ।
तालीशपत्रं बृहती मालत्याः कुसुमं नवम् ॥ ५५ ॥
विडङ्गं पृश्निपर्णी च कुष्ठं चन्दनपद्मकौ ।
अष्टाविंशतिभिः कल्कैरेतैरक्षसमन्वितैः ॥
चतुर्गुणं जलं दत्त्वा घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ५६ ॥

इन्द्रायन, त्रिफला, रेणुका, देवदारु, एलुआ, शालपर्णी, तगर, हल्दी, दारु हल्दी, उसवा, अनन्तमूल, फूलप्रियंगु, नीलकमल, इलायची, मंजीठ, दन्ती, अनार, केशर, तालीसपत्र, बडी कटेरी, मालतीके नवीन फूल, वायविडङ्ग, पृश्निपर्णी, कूठ, चन्दन और पद्माख इन २८ औषधियोंके दो दो तोले कल्कके साथ एक प्रस्थ घृतको चौगुना जल डालकर उत्तम प्रकारसे पकावे ॥ ५४-५६ ॥

अपस्मारे ज्वरे कासे शोषे मन्दानले क्षये ॥ ५७ ॥
वातरक्ते प्रतिश्याये तृतीयकचतुर्थके ।
वम्यर्शोमूत्रकृच्छ्रेषु विसर्पोपहतेषु च ॥ ५८ ॥
दोषोपहतचित्तानां गद्गदानामरेतसाम् ।
शतं स्त्रीणां च वन्ध्यानां वर्ण्यायुर्बलवर्द्धनम् ॥ ५९ ॥
अलक्ष्मीपापरक्षोघ्नं सर्वग्रहनिवारणम् ।
कल्याणकमिदं सर्पिः श्रेष्ठं पुंसवनेषु च ॥ ६० ॥

यह कल्याणकनामक घृत अपस्मार, ज्वर, खाँसी, शोष, मन्दाग्नि, क्षय, वातरक्त, प्रतिश्याय, तिजारी और चौथिया ज्वर, वमन, अर्श, मूत्रकृच्छ्र और