भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context६९८ | भैषज्यरत्नावली । | [ उन्माद-
वटीको उन्मादभञ्जिनी कहते हैं। यह वटी चातुर्थकज्वर, अपस्मार और उन्माद-रोगको नष्ट करती है ॥ २२-२५ ॥
उन्मादगजकेसरी ।
सूतं गन्धं शिला तुल्यं स्वर्णबीजं विचूर्ण्य च ।
भावयेदुग्रगन्धायाः क्वाथे मुनिदिनैः पृथक् ॥ २६ ॥
रास्नाक्वाथेन सप्तैव भावयित्वा विचूर्णयेत् ।
रसः सञ्जायते नूनमुन्मादगजकेसरी ॥ २७ ॥
अस्य माषः ससर्पिष्को लीढो हन्ति हठाद्द्रुतम् ।
उन्मादाख्यमपस्मारं भूतोन्मादमपि ज्वरम् ॥ २८ ॥
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, मैनसिल और शुद्ध धतूरेके बीज इनको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करके वच और रायसनके क्वाथमें पृथक् पृथक् सात दिनतक सात सात बार भावना देकर खरल करलेवे । इस प्रकार यह उन्मादगजकेशरीरस सिद्ध होता है । इसको प्रतिदिन एक एक माशे परिमाणं लेकर घृतके साथ सेवन करनेसे यह रस उन्माद, अपस्मार, भूतोन्माद और ज्वरको शीघ्र नष्ट करता है ॥ २६-२८ ॥
उन्मादगजांकुश ।
त्रिदिनं कनकद्रावैर्महाराष्ट्रीरसैः पुनः ।
विषमुष्टिद्रवैः सूतं समुत्थाप्यार्कचक्रिकाम् ॥ २९ ॥
कृत्वा तप्तां सगन्धां तां युक्त्या बन्धनमाचरेत् ।
तत्समं कनकं बीजमभ्रकं गन्धकं विषम् ॥ ३० ॥
मर्दनात्त्रिदिनं सर्वं वल्लमात्रं प्रयोजयेत् ।
दोषोन्मादं द्रुतं हन्ति भूतोन्मादं विशेषतः ॥ ३१ ॥
पारेको एक तोला लेकर धतूरेके पत्तोंके रस, जलपीपलके रस और कुचलेके रसमें क्रमसे तीन तीन दिनतक भावना देवे, फिर उसके साथ एक तोला शुद्ध गन्धक मिलाकर ताम्र चक्रिकाको यत्नपूर्वक स्थापन करके पुटपाक करे । फिर उसमें धतूरेके बीज, अभ्रकभस्म, शुद्ध गन्धक और शुद्ध मीठा तेलिया ये प्रत्येक एक एक तोला मिलाकर तीन दिनतक खरल करे । इस रसको प्रतिदिन दो दो रत्ती प्रमाण सेवन करनेसे वात पित्तादि दोषजन्य उन्माद और विशेषकर भूतोन्मादरोग शीघ्र नष्ट होता है ॥ २९-३१ ॥