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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 628 of 1416

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Page 628

६९६ भैषज्यरत्नावली । [ उन्माद-


लेकर एकत्र खरल करके आँखोंमें आँजनेसे सर्व प्रकारका भूतोन्मादरोग दूर होता है ॥ १४ ॥

निम्बधूप ।

निम्बपत्रवचाहिंगुसर्पनिर्मोकसर्षपैः ।
डाकिन्यादिहरो धूपो भूतोन्मादविनाशनः ॥ १५ ॥

नीमके पत्ते, वच, हींग, साँपकी केंचली और सरसों इन सबको समान भाग लेकर धूप देनेसे डाकिनी आदि भाग जाती हैं और भूतोन्माद शमन होता है ॥ १५ ॥

महाधूप ।

कार्पासास्थिमयूरपुच्छबृहतीनिर्मात्यपिण्डीतकै-
स्त्वग्वांशीवृषदंशविट्‌तुषवचाकेशाहिनिर्मोककैः ।
गोशृङ्गद्विपदन्त हिङ्गुमरिचैस्तुल्यैस्तु धूपः कृतः
स्कन्दान्मादपिशाचराक्षससुरावेशज्वरघ्नः स्मृतः ॥ १६ ॥

कपासके बीज (बिनौले), मोरकी पूँछ, बडी कटेरी, शिवका निर्माल्य, मैनफल, दारचीनी, वंशलोचन, बिलावकी सूखी विष्ठा, धानोंकी भूसी, वच, मनुष्यके बाल, साँपकी केंचली, गौका सींग, हाथीदाँत, हींग और काली मिरच इन सबको समान भाग लेकर एकत्र करके उन्मादरोगीको धूप देनेसे स्कन्द उन्माद, पिशाच, राक्षसबाधा, देवताका आवेश आदि कारणोंसे उत्पन्न हुआ भूतोन्माद और भूतज्वर भी नष्ट होता है ॥ १६ ॥

सारस्वत चूर्ण ।

कुष्ठाश्वगन्धे लवणाजमोदे द्वे जीरके त्रीणि कटूनि पाठा ।
मांगल्यपुष्पी च समान्यमूनि सर्वैः समानां च वचां विचूर्ण्य॥
ब्राह्मीरसेनाखिलमेव भाव्यं वारत्रयं शुष्कमिदं हि चूर्णम् ।
अक्षप्रमाणं मधुना घृतेन लिह्यान्नरः सप्तदिनानि चूर्णम् १८॥

कूठ, असगन्ध, सैंधानमक, अजमोद, कालाजीरा, सफेद जीरा, त्रिकुटा, पाठ और शंखपुष्पी इन सबको समान भाग लेकर चूर्ण करलेवे, फिर उसमें सब चूर्णकी बराबर वचका चूर्ण मिलाकर एकत्र करके ब्राह्मीके रसमें तीनबार भावना देकर धूपमें सुखालेवे । फिर उसको बारीक पीसकर रखलेवे । इस चूर्णको एक एक तोलेकी मात्रासे घृत और शहदके साथ मिलाकर सात दिनपर्यन्त सेवन करे ॥ १७ ॥ १८ ॥