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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

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Page 624
५९२भैषज्यरत्नावली ।[ दाह-

शतधौतघृतं दुग्धं नवनीतं पयोभवम् ।
कूष्माण्डं कर्कटी मोचं पनस स्वादुदाडिमम् ॥ १७॥
पटोलं पर्पटं द्राक्षा धात्रीफलपरूषकम् ।
बिम्बी तुम्बी पयःपेटी खर्जूरं धान्यकं मिषिः॥ १८ ॥
बालतालं पियालं चशृङ्गाटककशेरुकम् ।
मधूकपुष्पं ह्रीबेरं पथ्या तिक्तानि सर्वशः ॥ १९ ॥
शीताः प्रलेपा भूवेश्म सेकोऽभ्यङ्गोऽवगाहनम् ।
पद्मोत्पलदलक्षौमशय्याशीतलकाननम् ॥ २० ॥
कथा विचित्रा गीतानि शिशिरो मञ्जुभाषिणः ।
उशीरचन्दनालेपः शीताम्बु शिशिरानिलः॥ २१ ॥
धारागृहं प्रियास्पर्शः प्रनीरं हिमवालुका ।
सुधांशुरश्मयः स्नानं मणयो मधुरो रसः ॥ २२ ॥
पुरा यानि विधेयानि पित्तहारीणि तानि च ।
इति दाहवतां नृणां पथ्यवर्ग उदाहृतः ॥ २३ ॥

शालि और सांठीके चावल, मूँग, मसूर, चना, जा ये सब अन्न, जङ्गलके पशुपक्षियोंका मांभरस, खीलोंका मांड, खाजाका सत्तू, मिश्री, सौ बार धोयाहुआ घी, दूध, दूधसे निकाला हुआ मक्खन, पेठा, ककडी, केलेका मोचा, कटहल, मीठा अनार, परवल, पित्तपापडा, दाख, आमले, फालसे, कन्दुरी, लौकी, नारियल, खजूर धनियां, सौंफ, कच्चा ताडका फल, चिरौंजी, सिंघाडे, कसेरू, महुएके फूल, सुगन्ध-वाला, हरड, सब प्रकारके कडुवे पदार्थ, शीतल प्रलेप, भूमिगर्भस्थ गृह (तहखाना) में निवास, देहपर शीतल जलका छिडकना, सुगन्धित तेलोंकी मालिश, जलमें गोता लगाकर स्नान करना, कमल, कुमुद (बब्बूलों) से आच्छादित और जिसपर रेशमी वस्त्र बिछा हो ऐसी शय्यापर शयन, शीतल बगीचे उपवनोंमें भ्रमण, मधुरभाषी मनुष्योंसे मनोहर कथा एवं विचित्र गायनको सुनना, शीतल पदार्थ, खस और चन्दनका प्रलेप, शीतल जल, शीतल वायु, फुहारे युक्त गृह, प्रिय स्त्रीका आलिङ्गन, शीतल और सुगन्धित जल, कपूर, निर्मल चाँदनी, स्नान, रत्नोंका धारण करना, मधुर रसवाले पदार्थ और पित्ताधिकारमें जो पित्तनाशक पदार्थ कहेगये हैं वे सब दाहरोगियोंके लिये हितकारी हैं ॥ १६–२३ ॥