भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५८९
वमन और विरेचनादिके द्वारा संशोधन-संशमन ओषधियाँ, शयन, लंघन, परिश्रम, एक वर्षके पुराने शालिधानों और साठी धानोंके चावल, जौ, मूँग, उडद, गेहूँ, मटर, राग और खाण्डव यूष, कृष्णमृग, तीतर, लवा, बकरा, मुर्गा, मोर और खरगोश इनका मांस, वेसवार, हृदयको हितकारी विविध प्रकारके अन्नादिका भोजन, मदिरा, दूध, मिश्री, चौलाईका शाक, परवल, बिजौरानींबू, फालसे, खजूर, अनार, आमले, नारियल, दाख, पुराना, घी, कपूर, स्वच्छ जल, शीतल वायु, फुहारेवाले घर, चन्द्रमाकी चाँदनी, मणि रत्न आदिका धारण, इष्टमित्रोंकी संगति, रेशमी वस्त्र, सुन्दरी स्त्रीका आलिङ्गन, अतितीव्र गायन और तीव्र बाजोंका सुनना, शीतल जल, चंदनका लेप और स्नान ये सब मदात्ययरोगमें हितकारी हैं ॥ २०-२४ ॥
मदात्ययरोगमें अपथ्य ।
स्वेदोऽञ्जनं धूमपानं नावनं दन्तघर्षणम् ।
ताम्बूलं चेत्यपथ्यं स्यान्मदात्ययविकारिणाम् ॥ २५ ॥
स्वेद, अञ्जन, धूमपान, नस्य, दन्तधावन और ताम्बूलभक्षण ये सब मदात्ययरोगियोंको अहितकर हैं ॥ २५ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां मदात्ययरोगचिकित्सा ।
दाहकी चिकित्सा ।
यत्पित्तज्वरदाहोक्तं दाहे तत्सर्वमिष्यते ॥ १ ॥
पैत्तिकज्वरमें दाहनाशक जो औषधियाँ कहीगयी हैं, उन सबको दाहरोगमें प्रयोग करना चाहिये ॥ १ ॥
चन्दनाम्बुकणास्यन्दितालवृन्तोपवीजितः ।
सुप्याद्दाहार्दितोऽम्भोजकदलीदलसंस्तरे ॥ २ ॥
दाहरोगमें चन्दनको जलमें घिसकर उस जलमें ताडके पंखेको भिगोकर उसके द्वारा हवा करे, कमल वा केलेके कोमल पत्तोंपर रोगीको शयन करावे ॥ २ ॥
परिषेकावगाहेषु व्यञ्जनानां च सेवने ।
शस्यते शिशिरं तोयं तृष्णादाहोपशान्तये ॥ ३ ॥
तृषा और दाहको शान्त करनेके लिये शरीरपर शीतल जलका सेचन, जलमें गोता लगाकर स्नान करना, पंखेकी हवा और शीतल जल सेवन करे ॥ ३ ॥