भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextप्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । २९
दाख, गिलोय, कुम्मेर, त्रायमाण और सारिवा इनका क्वाथ बनाकर उसमें गुड डालकर सेवन करनेसे वातज्वर नष्ट होता है ॥ ५१ ॥
रास्नादि ।
रास्ना वृक्षादनी दारु सरलं सैलवालुकम् ।
कोष्णं सगुडसर्पिष्कं पिबेद्वातज्वरापहम् ॥ ५२ ॥
रायसन, बँदा, देवदारु, धूपसरल और एलवालुक इनके मन्दोष्ण क्वाथमें गुड और घृत मिलाकर पान करनेसे वातज्वर दूर होता है ॥ ५२ ॥
गुडूच्यादि ।
गुडूची शतपुष्पा च प्लक्षो रास्ना पुनर्नवा ।
त्रायमाणा कषायश्च गुडैर्वातज्वरापहः ॥ ५३ ॥
गिलोय, सौंफ, पाखर, रास्ना, पुनर्नवा और त्रायमाण इनके क्वाथमें गुड डालकर पान करनेसे वातज्वर नष्ट होता है ॥ ५३ ॥
दशमूलादि ।
श्रीफलः सर्वतोभद्रः कामदूती च श्योनकः ।
तर्कारी गोक्षुरः क्षुद्रा बृहती कलसी स्थिरा ॥ ५४ ॥
रास्ना कणा कणामूलं कुष्ठं शुण्ठी किरातकः ।
मुस्ता बलाऽमृता बाला द्राक्षा यासः शताह्विका ॥ ५५ ॥
एषां क्वाथो निहन्त्येव प्रभञ्जनकृतं ज्वरम् ।
सोपद्रवं च योगोऽयं सर्वयोगवरः स्मृतः ॥ ५६ ॥
बेलकी छाल, कुम्मेर, पाढल, अरलू, अरणी, गोखुरू, कटेरी, बडी कटेरी, पृष्ठपर्णी, शालपर्णी, रास्ना, पीपल, पीपलामूल, कूठ, सोंठ, चिरायता, नागरमोथा, खिरैंटी, गिलोय, सुगन्धवाला, दाख, जवासा और सोया इन औषधियोंका क्वाथ बनाकर पान करनेसे सम्पूर्ण उपद्रवोंसहित वातज्वर नाश होता है । यह योग समस्त योगोंमें श्रेष्ठ है ॥ ५४-५६ ॥
पित्तज्वरकी चिकित्सा ।
तिक्तादि ।
तिक्तामुस्तायवैः पाठाकट्फलाभ्यां सहोदकम् ।
पक्वं सशर्करं पीतं पाचनं पैत्तिके ज्वरे ॥ ५७ ॥