Skip to content
SarvaKosh
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 605 of 1416

Read in context
Page 605

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५७३


इलायची, लौंग, नागकेशर, बेरकी गुठलीकी गिरि, खीलें, फूलप्रियंगु, नागरमोथा, लालचन्दन और पीपल इन ओषधियोंके समान भाग चूर्णको शहद मिश्रीके साथ मिलाकर सेवन करनेसे वात, कफ और पित्त इन तीनों दोषोंसे उत्पन्न हुई वमन शमन होती है ॥ १५ ॥

रसेन्द्र ।

अजाजीधान्यपथ्याभिः सक्षौद्राभिः कटुत्रिकैः ।
एभिस्सार्द्ध भस्मसूतः सेव्यो वान्तिप्रशान्तये ॥ १६ ॥

कालाजीरा, धनियाँ, हरड, त्रिकुटा और शहद ये सब समान भाग और पारेकी भस्म आधा भाग इन सबको एकत्र मिलाकर वमनको शान्त करनेके लिये सेवन करना चाहिये ॥ १६ ॥

वृषध्वजरस ।

शुद्धं रस गन्धकं च लौहमेवं समांशिकम् ।
मधुकं चन्दनं धात्री सूक्ष्मैला सलवङ्गकम् ॥ १७ ॥
टङ्कणं पिप्पली मांसी तुल्यं पारदसम्मितम् ।
विदारीक्षुरसाभ्यां च भावयेद्दिनसप्तकम् ॥ १८ ॥
संशोष्य मर्दयेद्यामं छागीदुग्धेन यत्नतः ।
द्विगुञ्जं भक्षयेन्नित्यं विदारीरससंयुक्तम् ॥ १९ ॥
वातात्मिकां पित्तयुतां छर्दिं हन्ति सशोणिताम् ।
वृषध्वजरसो नाम वृषध्वजविनिर्मितः ॥ २० ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लोहभस्म, मुलहठी, लाल चन्दन, आमले, छोटी इलायची, लौंग, सुहागा, पीपल और बालछड इन सबको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करके विदारीकन्द और ईखके रसमें क्रमसे सात सात दिनतक भावना देवे । फिर उसको सुखाकर बकरीके दूधमें एक प्रहरतक खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । प्रतिदिन एक एक गोली विदारीकन्दके रसके साथ भक्षण करे । यह रस वातज, पित्तज और रुधिरकी वमनको दूर करता है ॥

पद्मकाद्य घृत ।

पद्मकामृतनिम्बानां धान्यचन्दनयोः पचेत् ।
कल्के क्वाथे च हविषः प्रस्थं छर्दिनिवारणम् ॥ २१ ॥
तृष्णारुचिप्रशमनं दाहज्वरहरं परम् ॥ २२ ॥