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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 593 of 1416

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Page 593

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५६१


इस अवलेहको आयुर्वेदज्ञ मुनियोंने कहा है । यह विशेषकर स्वरभङ्ग और प्रतिश्यायको दूर करता है एवं खाँसी, श्वास, मन्दाग्नि, गुल्म, प्रमेह, गलेके रोग, आनाह, मूत्रकृच्छ्र, ग्रन्थि और अर्बुद इन सबको नष्ट करता है ॥ २१-२२ ॥

व्याघ्रीघृत ।

व्याघ्रीस्वरसविपक्वं रास्नावाट्यालगोक्षुरव्योषैः ।
सर्पिः स्वरोपघातं हन्यात्कासं च पञ्चविधम् ॥ २३ ॥
“शुष्कद्रव्यमुपादाय स्वरसानामसम्भवे ।
वारिण्यष्टगुणे साध्यं ग्राह्यं पादावशेषितम् ॥”

हरी कटेरीके स्वरस एवं रायसन, खिरेंटी, गोखुरू और त्रिकुट। इनके कल्कके साथ यथाविधि घृतको सिद्ध करे । यह घृत उष्ण दुग्धके साथ पान करनेसे स्वरक्षय और पाँचो प्रकारकी खाँसीको नष्ट करता है । “कटेरीके स्वरसके अभावमें १ भाग सूखी कटेरीको लेकर अठगुने जलमें पकावे, जब चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उसको छानकर ग्रहण करे ” ॥ २३ ॥

सारस्वतघृत ( ब्राह्मीघृत ) ।

समूलपत्रमादाय ब्राह्मीं प्रक्षाल्य वारिणा ।
उदूखले क्षोदयित्वा रसं वस्त्रेण गालयेत् ॥ २४ ॥
रसे चतुर्गुणे तस्मिन् घृतप्रस्थं विपाचयेत् ।
औषधानि तु पेष्याणि तानीमानि प्रदापयेत् ॥ २५ ॥
हरिद्रा मालती कुष्ठं त्रिवृता सहरीतकी ।
एतेषां पलिकान्भागान् शेषाणि कार्षिकानि च ॥२६॥
पिप्पल्योऽथ विडङ्गानि सैन्धवं शर्करा वचा ।
सर्वमेतत्समालोड्य शनैर्मृद्वग्निना पचेत् ॥ २७ ॥

जड और पत्तोंसहित ब्राह्मीको जलसे धोकर ओखलीमें कूटकर वस्त्रमें उसका रस निचोड लेवे । ऐसा रस चार प्रस्थ, गौका घी एक प्रस्थ, एवं हल्दी, मालतीके फूल, कूठ, निसोत और हरड ये प्रत्येक ओषधि चार चार तोले, पीपल, वायविडंग, सेंधानमक, खाँड और वच ये प्रत्येक दो दो तोले इन सबको एकत्र पीसकर और उक्त रसमें मिलाकर मन्दमन्द अग्निके द्वारा घृतको पकावे, जब पकते पकते घृतमात्र शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर एक उत्तम पात्रमें भरकर रखदेवे ॥ २४–२७ ॥

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