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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 591 of 1416

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Page 591

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५५९

हन्ति त्र्यम्बकमभ्रमद्भुततरं वृष्यातिवृष्यं परं
वह्नेर्वृद्धिकरं रसायनवरं सर्व्वामयध्वंसि तत् ॥ ९ ॥

यह त्र्यम्बकाभ्र सेवन करतेही वात, कफ और पित्तसे उत्पन्नहुए वा त्रिदोषज अथवा बहुत जोरसे चिल्लानेसे और अनेक प्रकारके पानादिकोंके दोषसे उत्पन्न हुये स्वररोगको एवं खाँसी, श्वास, उरोरोग, यकृत्, हिक्का, तृषा, कामला, अर्श, संग्रहणी, विविध प्रकारके ज्वर, शोथ, क्षय, अर्बुद् और अन्यान्य सर्वप्रकारके रोगोंको नष्ट करता है । एवं अत्यन्त वीर्यवर्द्धक, अग्निको दीपन करनेवाला और श्रेष्ठ रसायन है ॥ ९ ॥

भैरवरस ।

रसं गन्धं विषं टङ्कं मरिचं चव्यचित्रकम् ।
आर्द्रकस्य रसेनैव सम्मर्द्य वटिकां ततः ॥ १० ॥
गुंजात्रयप्रमाणेन खादेत्तोयानुपानतः ।
स्वरभेदं निहन्त्याशु श्वासं कासं सुदुस्तरम् ॥ ११ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, शुद्ध मीठा तेलिया, सुहागा, मिरच, चव्य और चीता इनके समान भाग चूर्णको अदरखके रसमें खरल करके तीन तीन रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । प्रतिदिन एक एक गोली मन्दोष्ण जलके साथ सेवन करनेसे स्वरभेद, दारुण श्वास और कासरोग शीघ्र नष्ट होता है ॥ १० ॥ ११ ॥

किन्नरकण्ठरस ।

रसं गन्धकमभ्रं च माक्षिकं लौहमेव च ।
कर्षप्रमाणं संगृह्य वैक्रान्तं रसपादिकम् ॥ १२ ॥
वैक्रान्ताद्धं तथा हेम रौप्यं हेमचतुर्गुणम् ।
वासायाश्च तथा भार्ङ्ग्या बृहत्योरार्द्रकस्य च ॥ १३ ॥
स्वरसेन सरस्वत्या भावयित्वा पृथक् पृथक् ।
रक्तिद्वयमिताः कुर्याद्वटीश्छायाप्रशोषिताः ॥ १४ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, अभ्रकभस्म, सोनामक्खीभस्म और लोहभस्म ये प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष, वैक्रान्तमणिभस्म चार मासे, सुवर्णभस्म २ मासे और चाँदीकी भस्म ८ मासे इन सबको एकत्र पीसकर अडूसेके पत्ते, भारंगीकी जडकी छाल, कटेरी, बडीकटेरी, अदरख और ब्राह्मी इनके स्वरसमें अलग अलग भावना देकर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे और उनको छायामें सुखालवे ॥ १२–१४ ॥