भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context| ५५६ | भैषज्यरत्नावली । | [ हिक्काश्वास- |
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श्वासयोगमें पथ्य ।
विरेचनं स्वेदनधूमपानं प्रच्छर्द्दनादि स्वपनं दिवा च ।
पुरातनाः षष्टिक रक्तशालिकुलत्थगोधूमयवाः प्रशस्ताः ॥२२॥
शशादिभृङ्गतिन्तिरिलावदक्षशुकादयो धन्वमृगद्विजाश्च ।
पुरातनं सर्पिरजाप्रसूतं पयो घृतं चापि सुरा मधूनि ॥२३॥
निदिग्धिका वास्तुकतण्डुलीयं जीवन्तिका मूलकपोतिकं च ।
पटोलवार्त्ताकुरसोनपथ्या जम्बीरबिम्बीफलमातुलुङ्गम् ॥२४॥
द्राक्षा त्रुटिः पौष्करमुष्णवारि कटुत्रयं गोजनितं च मूत्रम् ।
अन्नानि पानानि च भेषजानि कफानिलघ्नानि च यानि यानि २५
वक्षः प्रदेशादपि पादयुग्मे करस्थयोर्मध्यमयोर्द्वयोश्च ।
प्रदीप्तलौहेन च कण्ठकूपे दाहोऽपि च श्वासिनि पथ्यवर्गः २६
विरेचन, स्वेदक्रिया, धूमपान, वमन कराना, दिनमें सोना, पुराने साँठी और लालशालिधानोंके चावल, कुलथी, गेहूँ, जौ, आदि अन्न, खरगोश, मोर, तीतर, लवा, मुर्गा, तोता और धन्वदेशजात पशु पक्षियोंका मांस, पुराना घी, बकरीका दूध, बकरीका घी, मदिरा, शहद, कटेरी, बथुआ, चौलाई, जीवंती, कच्ची मूली, कञ्ज, परवल, बगन, लहसुन, हरड, जम्बीरीनींबू, कन्दूरीका शाक, बिजौरानींबू, दाख, छोटी इलायची, पोहकरमूल, गरमजल, सोंठ, मिरच, पीपल, गोमूत्र, एवं कफ-वातनाशक अन्न, पान और ओषधियाँ, वक्षःस्थल, दोनों पाँव और दोनों हाथोंकी मध्यम अंगुलीकी मूल और कण्ठमें तपाये हुए लोहेके द्वारा दाह देना ये सब श्वास-रोगमें पथ्य हैं॥२२-२६॥
श्वासयोगमें अपथ्य ।
मूत्रोद्गारच्छर्दितृट्कासरोधो नस्यं बस्तिर्दन्तकाष्ठं श्रमश्च ।
पन्था भारो रेणवः सूर्यपादा विष्टम्भीनि ग्राम्यधर्मो विदाहि ॥
आनूपानामामिषं तैलभृष्टं निष्पावं च श्लेष्मकारिणि माषः ।
रक्तस्रावः पूर्ववातोऽनुपान मेषीसर्पिर्दुग्धमम्भोऽपि दुष्टम् ॥
मत्स्याः कन्दाः सषपाश्चान्नपान रूक्षं शीतं गुर्व्वपि श्वास्यमित्रम्।
मूत्र, डकार, वमन, तृषा, खाँसी इनक वेगको रोकना, नस्य, वस्तिकर्म, दतौन करना, परिश्रम करना, मार्गमें चलना, बोझ उठाना, धूल और धूपका सेवन, विष्टम्भी ( मलरोधक ) पदार्थ, स्त्रीप्रसङ्ग, दाहकारक पदार्थ, अनूपदेशजन्य जीवोंका मांस, तेलमें तले हुए पदार्थ, सेमकी फली, कफकारक पदार्थ, उडद, रुधिरका