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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 583 of 1416

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Page 583

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५५१

अगस्त्यहरीतकी ।

दशमूलीं स्वयंगुप्तां शङ्खपुष्पीं शठीं बलाम् ।
हस्तिपिप्पल्पपामार्गपिप्पलीमूलचित्रकान् ॥ ८९ ॥
भाङ्गीं पुष्करमूलं च द्विपलांशं यवाढकम् ।
हरीतकीशतं चैव जले पञ्चाढके पचेत् ॥ ९० ॥
यवैः स्विन्नैः कषायं तं पूतं तच्चाभयाशतम् ।
पचेद् गुडतुलां दत्त्वा कुडवं च पृथक् घृतात् ॥ ९१ ॥
तैलात्सपिप्पलीचूर्णात् सिद्धे शीते च माक्षिकात् ।
लिह्याद् द्वे चाभये नित्यमतः खादेद्रसायनात् ॥ ९२ ॥

दशमूल, कौंचके बीज, शङ्खपुष्पी, कचूर, खिरैंटी, गजपीपल, चिरचिटा, पीपलामूल, चीतेकी जड, भारङ्गी और पोहकरमूल ये प्रत्येक औषधि आठ आठ तोले, पोटली बद्ध जौ १ आढक और उत्तम हरडें सौ लेवे। सबको एकत्र कर ५ आढक जलमें पकावे। जब चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतार कर छानलेवे और उक्त हरडोंकी गुठली निकाल डाले। फिर हरडोंको १६ तोले घी और १६ तोले तेलमें भूनकर उक्त क्वाथमें डालकर और सौ पल गुड डालकर पकावे। जब उत्तम प्रकारसे पककर सिद्ध होजाय तब नीचे उतारकर उसमें पीपलका चूर्ण १६ तोले और शितल होजानेपर शहद १६ तोले मिलादेवे। इसमेंसे प्रतिदिन दो दो हरडें भक्षण करे और ६-६ माशे अवलेह सेवन करे ॥ ८९-९२ ॥

तद्वलीपलितं हन्याद्वर्णांयुर्बलवर्द्धनम् ।
पञ्च कासान् क्षय श्वासं हिक्कां च विषमज्वरान् ॥ ९३ ॥
हन्यात्तथा ग्रहण्यर्शोहृद्रोगारुचिपीनसान् ।
अगस्त्यविहितं धन्यमिदं श्रेष्ठं रसायनम् ॥ ९४ ॥

वह वली-पलितरोगको नष्ट करता है और बल, वर्ण आयुकी वृद्धि करता है तथा पाँचों प्रकारकी खाँसी, क्षय, श्वास, हिचकी, विषमज्वर, संग्रहणी, बवासीर, हृदयरोग, अरुचि और पीसादि रोगको दूर करता है। इस श्रेष्ठ रसायनको अगस्त्यऋषिने निर्माण किया है। ॥९३ ॥ ९४ ॥

हिंस्त्राद्यघृत ।

हिंस्राविडङ्गपूतीकत्रिफलाव्योषचित्रकैः ।
द्विक्षीरं सर्पिषः प्रस्थं चतुर्गुणजलान्वितम् ॥ ९५ ॥