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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 58 of 1416

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Page 58

२६ | भैषज्यरत्नावली । | [ चिकित्सा-


नागरादि ।

नागरं देवकाष्ठं च ध्यामकं बृहतीद्वयम् ।
दद्यात्पाचनकं पूर्वं ज्वरितेभ्यो ज्वरापहम् ॥ ३६ ॥
ज्वररोगीको साँठ, देवदारु, लामज्जक तृण ( अभावमें खस ), बडी कटेरी और छोटी कटेरी इनका क्वाथ सेवन करानेसे ज्वर नष्ट होता है ॥ ३६ ॥

किराततिक्तादि ।

किराततिक्तकं मुस्तं गुडूचीं विश्वभेषजम् ।
पाठामुशीरं सोदीच्यं पिबेद्वा ज्वरशान्तये ॥ ३७ ॥
चिरायता, नागरमोथा, गिलोय, सोंठ, पाठ, खस और सुगन्धवाला इनका क्वाथ पान करनेसे सम्पूर्ण ज्वर शान्त होते हैं ॥ ३७ ॥

वातज्वरकी चिकित्सा ।

बिल्वादि ।

बिल्वादिपञ्चमूलस्य क्वाथः स्याद्वातिके ज्वरे ।
पाचनः पिप्पलीमूलगुडूचीविश्वजोऽथवा ॥ ३८ ॥
वातज्वरमें-बेल, शोनापाठा, अरलू, कुम्मेर, पाढल और अरणी इनकी छालका क्वाथ अथवा पीपलामूल, गिलोय और सोंठ इनका यथाविधि क्वाथ बनाकर देना चाहिये ॥ ३८ ॥

भूनिम्बादि ।

भूनिम्बमुस्ताजलकण्टकारीद्वयामृतागोक्षुरनागराणाम् ।
सशालपर्णीद्वयपौष्कराणां क्वाथं पिबेद्वातभवज्वरार्त्तः ३९॥
वातज्वरसे पीडित रोगी चिरायता, नागरमोथा, सुगन्धवाला, कटेरी, बडी कटेरी, गिलोय, गोखरू, सोंठ, शालपर्णी, पृष्ठपर्णी और पोहकरमूल इन औषधियोंका क्वाथ बनाकर पान करे तो वातसम्बन्धी ज्वर शमन होते हैं ॥ ३९ ॥

विश्वादि ।

विश्वामृताग्रंथिकसिद्धतोयं महज्ज्वरः स्यात्पिबतः कुतोऽयम् ।
क्वाथोऽथकुस्तुम्बुरुदेवदारुक्षुद्रौषधैः पाचनमत्र चारु॥१४०॥
सोंठ, गिलोय और पीपलामूल इनका क्वाथ पान करानेसे अथवा धनियाँ देवदारु, कटेरी और साठ इनका क्वाथ पान करानेसे वातज्वर नष्ट होता है ॥ १४० ॥