भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context५२६ भैषज्यरत्नावली । [ कासरोग-
चार गोलियाँ सेवन करे और पत्तांस हित अदरखके रसका अनुपान करे॥११६-११७॥
पानीयं पीतमन्ते ध्रुवमपहरति क्षिप्रमादौ विकारान्
कोष्ठे दुष्टाग्निजातान् ज्वरमुदररुजो राजयक्ष्मक्षयं च ।
कासं श्वासं सशोथं नयनपरिभवं मेहमेदोविकारान्
छर्दिं शूलाम्लपित्तं तृषमपि महतीं गुल्मजालं विशालम्॥११८
पाण्डुस्त्वं रक्तपित्तं गरगरलगदान् पीनसान्प्लीहरोगान्
हन्त्यादामाशयोत्थान् कफपवनकृतान्पित्तरोगानशेषान्
बल्यो वृष्यश्च योग्यस्तरुणतरकरः सर्वरोगे प्रशस्तः
पथ्यं मांसैश्च यूषैर्घृतपरिलुलितैर्गव्यदुग्धैश्च भूयः॥ १९ ॥
भोज्यं मिष्टं यथेष्टं ललितललनया दीमानं मुदा य-
च्छृङ्गाराभ्रेण कामी युवतिजनशताभोगयोगादतृतः ।
वर्ज्यं शाखाम्लमादौ दिनकतिचिदथ स्वेच्छया भोज्यमन्य-
दीर्घायुः काममूर्त्तिर्गतवलिपलिरतो मानवोऽस्य प्रसादात्॥१२०
यह शृङ्गाराभ्र-कोष्ठगत दूषित अग्निके द्वारा उत्पन्नहुए सम्पूर्ण विकारोंको निस्सन्देह नष्ट करता है एवं ज्वर, उदररोग, राजयक्ष्मा, क्षय, खाँसी, श्वास, शोथ, नेत्रविकार, प्रमेह, मेदरोग, वमन, शूल, अम्लपित्त, तृषा, वायुगोला, पाण्डु, रक्तपित्त, विषोत्पन्नरोग, पीनस, तिल्ली एवं आमाशयके विकृत होनेसे उत्पन्नहुए रोग और कफ-वात-पित्तजन्य सम्पूर्ण उपद्रवोंको दूर करता है । यह बलकारक, वीर्यवर्द्धक, युवावस्थाको उत्पन्न करनेवाला और सब रोगोंमें सेवन करने योग्य है । इसपर घृतके द्वारा सिद्ध किया हुआ मांसका यूष, गौका दूध, घी, सुन्दर स्त्रीके द्वारा हर्षसे दियेहुए मधुर भोज्यपदार्थोंका भोजन करना पथ्य है । इसको सेवन करनेसे कामी पुरुष सैकड़ों स्त्रियोंको भोगनसे भी संतुष्ट नहीं होता । इसको सेवन करते समय कुछ दिनके लिये शाक और अम्लपदार्थ त्यागदेने चाहिये। एव अन्यान्य पदार्थ यथेच्छरूपसे सेवन करने चाहिये। इस औषधिके प्रसादसे मनुष्य दीर्घायुवाला, कामदेवकी समान रूपवान् और वली पलितरोगसे मुक्त होता है ॥ १८-१२० ॥
सार्वभौमरस ।
जीर्णं सुवर्णं लोहं वा यद्यत्रैव प्रदीयते ।
तदयं सर्वरोगाणां सार्वभौमो न संशयः ॥ २१ ॥