भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context| ५२४ | भैषज्यरत्नावली । | कासरोग- |
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विभीतकप्रमाणेण प्रातरेकां तु भक्षयेत् ॥
कासं श्वासं हरेत्क्षुद्राक्वाथस्तदनु कृष्णया ॥ १०७ ॥
शुद्ध पारा, १ तोला, शुद्ध गन्धक २ तोले, पीपल ३ तोले, हरड ४ तोले, बहेडा ५ तोले, अड़सेकी छाल ६ तोले और भारङ्गी ७ तोले इन सबको एकत्र चूर्ण करके बबूरकी छालके क्वाथमें २१ बार भावना देकर दो दो तोलेकी गोलियाँ बनालेवे । प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक गोली शहदके साथ मिलाकर भक्षण करे और ऊपरसे पीपलका चूर्ण डालकर कटेरीका क्वाथ पान करे। इससे श्वास, कासरोग दूर होता है ॥ १०५-१०७ ॥
लक्ष्मीविलासरस ।
शुद्धसूतं सतालं च तालाद्धं रसखर्परम् ।
वंगं ताम्रं घनं कान्तं कांस्यं गन्धं पलं पलम् ॥ १०८ ॥
केशराजरसेनापि भावना दिवसत्रयम् ।
कुलत्थस्य रसेनाथ भावयेच्च पुनः पुनः ॥ १०९ ॥
एला जातीफलाख्यं च तेजपत्रलवङ्गकम् ।
यमानी जीरकं चैव त्रिकटु त्रिफला समम् ॥ ११० ॥
नतं भृङ्गं वंशगर्भं कर्षमात्रं च कारयेत् ।
भावयेच्च रसेनाथ गोलयेत्सर्वमौषधम् ॥
छायाशुष्का वटी कार्या चणकप्रमिता तथा ॥ १११ ॥
शुद्ध पारा और हरताल ये दोनों चार चार तोले, खपरिया दो तोले, वङ्गभस्म, ताम्रभस्म, अभ्रकभस्म, कान्तलोहभस्म, काँसेकी भस्म और शुद्ध गन्धक इन सबको चार चार तोले लेकर एकत्रित करके काले भाँगरेके रसमें और कुलथीके रसमें पृथक् पृथक् तीन तीन दिनतक भावना देवे । फिर उसमें इलायची, जायफल, तेजपात, लौंग, अजवायन, जीरा, त्रिकुटा, त्रिफला, तगर, दारचीनी और वंशलोचन इन प्रत्येकका चूर्ण दो दो तोले मिलाकर भाँगरेके रस और कुलथीके क्वाथके साथ खरल करके छायामें सुखा लेवे और चनेकी बराबर गोलियाँ बनालेवे ॥ १०८-१११ ॥
शीताम्बुना पिबेद्धीमान् सर्वकासनिवृत्तये ।
मत्स्यं मांसं तथा क्षीरं पथ्यं स्यात्स्निग्धभोजनम् ॥ ११२ ॥