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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 550 of 1416

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Page 550

५१८ भैषज्यरत्नावली । [ कासरोग-

भाग लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे । फिर चूर्णसे दुगुना गुड़ मिलाकर इमलीके बीजकी बराबर गोलियाँ बनाकर प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक गोली सेवन करे । इस विजयभैरव रसको ब्रह्माने निर्माण किया है। यह रस—खाँसी, श्वास, क्षय, गुल्म, प्रमेह, विषमज्वर, अजीर्ण, संग्रहणी, पाण्डु, अरुचि, अतिसार, सूतिका-रोग, अपान, हृद्रोग, शूल, वातरोग, कण्ठगतरोग इत्यादि विकारोंको नष्ट करताहै६१-६६

काससंहारभैरव रस ।

रसगन्धकताम्राभ्रशङ्खटङ्कणलौहकम् ।
मरिचं कुष्ठतालीशजातीफललवङ्गकम् ॥ ६६ ॥
कार्षिकं चूर्णमादाय दण्डेनामर्द्य भावयेत् ।
मेकपर्णी केशराजो निर्गुण्डी काकमाचिका ॥ ६७ ॥
द्रोणपुष्पी शालपर्णी ग्रीष्मसुन्दरमेव च ।
भार्गी हरीतकी वासा कार्षिकैः पत्रज रसैः ॥
वटिकां कारयेद्वैद्यः पंचगुञ्जाप्रमाणतः ॥ ६८ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, ताम्रभस्म, अभ्रकभस्म, शङ्खभस्म, सुहागा, लोहभस्म, मिरच, कूठ, तालीसपत्र, जायफल और लौंग प्रत्येकके एक एक कर्ष चूर्णको लेकर सबको एकत्र बारीक पीसलेवे। फिर खरलमें डालकर मण्डूकपर्णी, भाँगरा, निर्गुण्डी, मकोय, गूमा, शालपर्णी, ग्रीष्मसुन्दर ( शाकविशेष ), भारंगी, हरड और अडूसा इन प्रत्येकके पत्तोंके एक एक कर्ष प्रमाण रसमें भावना देकर पाँच पाँच रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे ॥ ६६–६८ ॥

वातजं पित्तजं कासं द्वन्द्वजं चिरकालजम् ।
निहन्ति नात्र सन्देहो भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ६९ ॥
श्रीमद्गहननाथेन काससंहारभैरवः ।
रसोऽयं निर्मितो यत्नाल्लोकरक्षणहेतवे ॥ ७० ॥
वासा शुण्ठी कण्टकारीक्वाथेन पाययेद् बुधः ।
कासं नानाविधं हन्ति श्वासमुग्रमरोचकम् ॥
बलवर्णकरः श्रीदः पुष्टिदो वह्निदीपनः ॥ ७१ ॥

यह रस—वातज, पित्तज, द्वन्द्वज, और बहुत पुरानी खाँसीको इस प्रकार नष्ट करदेता है; जैसे—सूर्यका प्रकाश अन्धकारको दूर करदेता है। इस कास-