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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 548 of 1416

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Page 548
४१६भैषज्यरत्नावली ।[ कासरोग-

दाहं मोहमशेषदोषजनितं शूलं बलास कृमिं
छर्दिं पाण्डुहलीमकं गलगदं विस्फोटकं कामलाम् ॥ ५३ ॥
मन्दाग्निं ग्रहणीं क्षयं च यकृतं प्लीहानमर्शांसि षट्
हन्त्यादामकफोद्भवानपि गदाञ्छ्रीडामरानन्दकम् ।
बल्यं वृष्यमशेषदोषहरणं धातुप्रदं कामिनां
मेध्यं हृद्यरसायनं हरमुखाज्ज्ञात्वा मया भाषितम् ॥ ५४ ॥

आमलेके रसके द्वारा भस्म की हुई अभ्रकको ४ तोले लेकर कटेरी, अडूसेकी जड, शालपर्णी, बेलकी जड, शोनापाठाकी जड, पाढरकी जड, पिठवन, भारङ्गी, अदरख, चीतेकी जड, पीपलामूल, गोखुरू, चव्य, चिरचिटा और कौंचके बीज इन औषधियोंके चार चार तोले रसमें पृथक् पृथक् खरल करकेआधी आधी रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। इसकी प्रतिदिन एक एक गोली सेवन करनेसे यह श्रीडामरानन्दाभ्रक पाँचों प्रकारकी खाँसी, श्वास, स्वरभङ्ग, उरःक्षत, हिचकी, ज्वर, पीनस, प्रमेह, गुल्म, अरुचि यक्ष्म, अम्लपित्त, क्षय, दाह, मूर्च्छा और सम्पूर्ण दोषजनित शूल, कफविकार, कृमि, वमन, पाण्डु, हलीमक, कण्ठरोग, फोडा, कामला, मन्दाग्नि, संग्रहणी, यकृत् विकार, प्लीहा, छः प्रकारका अर्श, आमवात और कफजन्य रोग आदि व्याधियोंको शीघ्र नष्ट करता है। एवं बलकारक, वीर्यवर्द्धक, सम्पूर्णदोषनाशक, कामी पुरुषोंके धातुवृद्धि करनेवाला, मेधाजनक, हृदयको हितकर और रसायन है। मैं ( डामरानन्द ) ने शिवजी महाराजके मुखसे श्रवणकर इस अभ्रकको वर्णन किया है ॥ ५२–५४ ॥

महाकालेश्वररस ।

मृतं लौहं मृतं वङ्गं मृतार्कं मृतमभ्रकम् ।
शुद्धं सूतं च गन्धं च माक्षिकं हिङ्गुलं विषम् ॥ ५५ ॥
जातीफलं लवङ्गं च त्वगेला नागकेशरम् ।
उन्मत्तस्य च बीजानि जयपालं च शोधितम् ॥ ५६ ॥
एतानि समभागानि मरिचं हरनेत्रकम् ।
सर्वं द्रव्यं क्षिपेत्खल्ले लौहदण्डेन मर्दयेत् ॥ ५७ ॥
शक्राशनस्य स्वरसैर्भावयेदेकविंशतिम् ।
गुञ्जामात्रा प्रदातव्या आर्द्रकस्यरसैर्युता ॥ ५८ ॥