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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

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Page 544
५१२भैषज्यरत्नावली ।[ कासरोग-

अत्यन्त दीपन होती है । मोदक अग्निके संयोग होनेसे चूर्णकी अपेक्षा हलके होते हैं ॥ २६–२९ ॥

कासान्तक ।

त्रिफलाव्योषचूर्णं च समं भागं प्रकल्पयेत् ।
मधुना सह पानात्तु दुष्टकासं नियच्छति ॥ ३१ ॥
त्रिफला और त्रिकुटा इनका समान भाग चूर्ण लेकर शहदके साथ सेवन करनेसे अतिदुष्ट खाँसी नष्ट होती है ॥ ३१ ॥

कासान्तकरस ।

सूतं गन्धं विषं चैव शालपर्णीं च धान्यकम् ।
यावन्त्येतानि चूर्णानि तावन्मात्रं मरीचकम् ॥
गुञ्जाचतुष्टयं खादेन्मधुना कासशान्तये ॥ ३२ ॥
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, शुद्ध मीठा तेलिया, शालपर्णी और धनिया इन सबका चूर्ण समान भाग और सब चूर्णकी बराबर मिरचोंका चूर्ण मिलाकर जलके द्वारा खरल करके चार चार रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । एक एक गोली शहदके साथ खानेसे कासरोग शान्त होता है ॥ ३२ ॥

कासकुठार ।

हिङ्गुलं मरिचं गन्धं सव्योषं टङ्कणं तथा ॥
द्विगुञ्जामाईकद्रावैः सन्निपातं सुदारुणम् ॥
कासं नानाविधं हन्ति शिरोरोगं विनाशयेत् ॥ ३३ ॥
हींग, मिरच, शुद्ध गन्धक, त्रिकुटा और सुहागा ये प्रत्येक ओषधि समान भाग लेकर अदरखके रसके साथ खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इनको सेवन करनेसे दारुण सन्निपात अनेक प्रकारकी खाँसी और शिरकी पीडा-ये सब रोग नष्ट होते हैं ॥ ३३ ॥

पित्तकासान्तकरस ।

भस्म ताम्राभ्रकान्तानां कासमर्दत्वचो रसैः ।
मुनिजैर्वैतसाम्लैश्च दिनं मर्द्यं सुपिण्डितम् ॥ ३४ ॥
निष्कार्द्धं पित्तकासार्त्तो भक्षयेच्च दिनत्रयम् ।
कासश्वासाग्निमान्द्यं च क्षयं चापि निहन्त्यलम् ॥ ३५ ॥