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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 523 of 1416

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Page 523
चिकित्साभाषाटीकासहिता ।४९१

ये तप्ता विविधैर्ज्वरैः श्रममदोन्मादः प्रमादं गता-
स्ते सर्वे विगतामया हतरुजः स्युः पोट्टलीसेवनात् ॥ १४० ॥

विषम पदार्थों के भक्षण करनेसे जिनका शरीर शुष्क होगया है, जो क्षयरोग और वाताष्ठीलारोगसे पीडित हैं और जो पाण्डुरोगसे जो कुवैद्योंकी कुचिकित्साके द्वारा असाध्य होगये हैं, जो विविधप्रकारके ज्वरोंसे सन्तप्त हैं और जो अत्यन्त परिश्रम व अत्यन्त मद्यपान करनेसे अथवा उन्मादसे पीडित हैं और जो भाग्यहीन राजयक्ष्मारोगी हैं वे इस पोट्टलीको सेवन करनेसे सम्पूर्ण रोगोंसे मुक्त होकर आरोग्य होते हैं ॥ १४० ॥

हेमगर्भपोट्टलीरस ।

रसभस्म त्रयो भागा भागैकं हेमभस्मकम् ।
मृतताम्रस्य भागैकं भागैकं गन्धकस्य च ॥ ४१ ॥
मर्दयेच्चित्रकद्रावैर्द्वियामान्ते समुद्धरेत् ।
पूर्या वराटिका तेन टङ्कणेन विलेपयेत् ॥ ४२ ॥
वराटीं पूरयेद्भाण्डे रुद्ध्वा गजपुटे पचेत् ।
विचूर्णयेत्स्वाङ्गशीते पोट्टलीं हेमगर्भिकाम् ॥
मृगाङ्कवच्चतुर्गुञ्जाभक्षणाद्राजयक्ष्मनुत् ॥ ४३ ॥

पारेकी भस्म ३ तोले, सुवर्णभस्म १ तोला, ताँबेकी भस्म १ तोला और शुद्ध गन्धक १ तोला लेवे, सबको दो प्रहरतक चलाकर ढकनमें खरल करके एक कौडीमें भरकर सुहागेसे उसका मुँह बंद करके फिर उस कौडीको एक मिट्टीके पात्रमें रखकर उस पात्रका मुह बन्द करके गजपुटमें पकावे । जब अच्छे प्रकार पककर स्वाङ्गशीतल होजाय तब औषध निकालकर बारीक चूर्ण करलेवे । इस हेमगर्भपोट्टलीनामक रसको मृगांकरसकी समान चार चार रत्ती परिमाण सेवन करनेसे राजयक्ष्मारोग नष्ट होता है ॥ ४१–४३ ॥

रत्नगर्भपोट्टलीरस ।

रसं वज्रं हेम तारं नागं लौहं च ताम्रकम् ।
तुल्यांशं मारितं योज्यं मुक्तामाक्षिकविद्रुमम् ॥ ४४ ॥
शङ्खं तुत्थं च तुल्यांशं सप्ताहं चार्द्रकद्रवैः ।
मर्दयित्वा विचूर्ण्याथ तेन पूर्या वराटिका ॥ ४५ ॥