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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

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चिकित्सा ]भाषाटीकासहिता ।४८९

सुवर्णभस्म १ तोला, रससिन्दूर २ ताले, मोतीकी भस्म ३ तोले, शुद्ध गन्धक ४ तोले, स्वर्णमाक्षिक भस्म ५ तोले, चाँदीकी भस्म ४ तोले, मूँगेकी भस्म ७ तोले और सुहागा २ तोले इन सब औषधियोंको एकत्र कागजी नींबूके रसके साथ तीन दिनतक खरल करके गोलासा बनाकर तीक्ष्ण धूपमें सुखालेवे। फिर उस गोलेको मूषामें रखकर उसके ऊपर कपड़ौटीकर नमकसे भरे हुए मिट्टीके पात्रमें बन्द करके चार प्रहरतक पकावे। जब स्वाङ्गशीतल होजाय तब औषधि निकालकर बारीक चूर्ण करलेवे। फिर समस्त चूर्णका चौसठवाँ भाग हीरेकी भस्म (हीरेके अभावमें सम्पूर्ण चूर्णका १६ वाँ भाग वैक्रान्तमणिकी भस्म) मिलादेवे ॥ २७-२९ ॥

महामृगांकः खलु सिद्ध एष श्रीनन्दिनाथप्रकटीकृतोऽयम् ।
वल्लोऽस्यसेव्योमरिचाज्ययुक्तः सेव्योऽथवापिप्पलिकामेतः ३०
अत्रोपचाराः कर्त्तव्याः सर्वे क्षयगदोदिताः ।
बल्यं घृतं च भोक्तव्यं त्याज्यं शूरविरोधि यत् ॥ ३१ ॥
यक्ष्माणं बहुरूपिणं ज्वरगणं गुल्म तथा विद्रधिं
मन्दाग्निं स्वरभेदकासमरुचिं वान्तिं च मूर्च्छा भ्रमिम् ।
अष्टावेव महागदान् गदगणान्पाण्ड्वामयान्कामलां
पित्तार्त्तिं समलग्रहान्बहुविधानन्यांस्तथा नाशयेत् ॥३२॥

इस प्रकार यह महामृगाङ्करस सिद्ध होता है। इसको श्रीनन्दिनाथजीने निर्माण किया ह। इस रसको दा रत्ती प्रमाण लेकर कालीमिरचोंके चूर्ण और घृतके साथ अथवा पीपलके चूर्ण आर घृतके साथ मिलाकर सेवन करना चाहिये। इसके सेवन करनेपर क्षयरोगमें कहेहुइ सम्पूर्ण पदार्थोंका उपचार करना चाहिये और बलकारक पदार्थ, घृत तथा घृतके बने खाद्य द्रव्योंका सेवन करना चाहिये। एवं प्रकृतिके विरुद्ध पदार्थोंको त्यागदेना चाहिये। यह रस विविध प्रकारके यक्ष्मारोग, सर्व प्रकारके ज्वर, गुल्म, विद्रधिरोग, मन्दाग्नि स्वरभंग, खाँसी, अरुचि, वमन, मूर्च्छा, भ्रम, पाण्डुरोग, कामला, पित्तसम्बन्धी विकार और अन्यान्य अत्यन्त भयंकर व्याधिसमूहको शीघ्र नष्ट करता है ॥ १३०-३२ ॥

लोकेश्वरपोट्टलीरस।

भस्मसूताच्चतुर्थांशं मृतस्वर्णं प्रदापयेत् ।
द्विगुणं गन्धकं दत्त्वा मर्दयेच्चित्रकाम्बुना ॥ ३३ ॥