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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 515 of 1416

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Page 515

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४८३

कल्याणसुन्दराभ्ररस ।

वज्राभ्रमेकपलिकं पुटनैः सुजीर्णं धात्रीपयोदबृहती-
शतमूलिकेक्षुः । बिल्वाग्निमन्थजलवासककण्टकारी-
श्योनाकपाटलिबलाश्च रसैरमीषाम् ॥ सम्मर्दितं पलमितैः
पृथगेकशश्च गुञ्जासमं सुवलितं वटिकाकृतं च ॥ ९३ ॥

पुटपाकके द्वारा उत्तम प्रकारसे भस्म किये हुए वज्र अभ्रकको ४ तोले प्रमाण लेकर आमले, नागरमोथा, बडीकटेरी, शतावर, ईख, बेलकी छाल, अरणी, सुगन्धवाला, अडूसेके पत्ते, कटेरी, सोनापाठा, पाढल और खिरेंटी इन प्रत्येक ओषधिके चार-चार तोले रसके साथ पृथक् पृथक् खरल करके एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे ॥ ९३ ॥

यक्ष्मक्षयौ सकलशोषबलासपित्तं श्वासं समीरमरुचिं
सकलाङ्गसादम् । शोथं स्वरक्षयमजीर्णमुदर्दशूलं मेहं
ज्वरं विषमुरोग्रहपाण्डुहिक्काः ॥ ९४ ॥ कार्श्यं कृमिं
बलविनाशनमम्लपित्तं प्लीहामयं सहहलीमकमस्र-
गुल्मम् । तृष्णामवातनिचयं ग्रहणीं प्रदुष्टां विस्फोट-
कुष्ठनयनास्यशिरोगदांश्च ॥ ९५ ॥ मूर्च्छां वमिं विर-
सतां विनिहन्ति सद्यः कल्याणसुन्दरमिदं बलदं सुवृ-
ष्यम् । मेध्यं रसायनवरं सकलामयानां नाशाय यक्ष्म-
निवहे कथितं हरेण ॥ ९६ ॥

यह कल्याणसुन्दरनामक रस—यक्ष्मा, क्षय, सम्पूर्ण शोष, कफ-पित्तसम्बन्धी रोग, श्वास, वातविकार, अरुचि समस्त शारीरिकपीडा, सूजन, स्वरभङ्ग, अजीर्ण, उदरशूल, प्रमेह, ज्वर, विषविकार, उरोग्रह, पाण्डुरोग, हिक्का, कृशता, कृमिरोग, बलनाशक, अम्लपित्त, प्लीहा, हलीमक, रक्तगुल्म, तृषा, आमवात, दुष्टसंग्रहणी, स्फोटक, कुष्ठ, नेत्र मुख और शिरके सम्पूर्ण रोग, मूर्च्छा, वमन, मुखकी नीरसता आदि व्याधियोंको शीघ्र नष्ट करता है । एवं अत्यन्त बलकारक, वीर्यवर्द्धक, पुष्टिकारक, मेधाजनक और सकल रोगोंको नाश करनेके लिये परमोत्कृष्ट रसायन है । यह रस विशेषकर यक्ष्मारोगके नष्ट करनेके लिये शिवजीने वर्णन किया है ॥ ९४-९६ ॥