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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 488 of 1416

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Page 488

४५६ भैशज्यरत्नावली । [ रक्तपित्त -


उस पेठेको धूपमें सुखालेवे । पश्चात् उक्त सुखायेहुए पेठेके टुकडोंका १०० पल चूर्णको एक उत्तम ताँबेके पात्रमें डालकर एक प्रस्थ गरम घृतमें धीरे धीरे भूने, जब वह भुनते २ मधुकी समान लाल होजाय तब उसको पूर्वोक्त पेठेके रसके साथ सौ पल खाँड मिलाकर यथाविधि पकावे । जब उत्तम प्रकारसे पाक सिद्ध होजाय तब पीपल, सोंठ और जीरा प्रत्येक दो पल, दारचीनी, छोटी इलायची, तेजपात, काली मिरच और धनियाँ ये प्रत्येक औषधि दो दो तोले बारीक पीसकर मिलादेवे और शीतल होजानेपर ६४ तोले शहद डालकर करछीसे सबको एकमएक करके घीके चिकने बर्त्तनमें भरकर रखदेवे ७४-७६

तद्यथाग्निबलं खादेद्रक्तपित्ती क्षतक्षयी ॥ ७७ ॥
कासश्वासतमश्छर्दितृष्णाज्वरनिपीडितः ।
वृष्यं पुनर्नवकरं बलवर्णप्रसादनम् ॥ ७८ ॥
उरःसन्धानकरणं बृंहणं स्वरवर्द्धनम् ।
अश्विभ्यां निर्मितं श्रेष्ठं कूष्माण्डकरसायनम् ॥ ७९ ॥
[ “ खण्डामलकमानानुसारात्कूष्माण्डकद्रवात् ।
पात्रं पाकाय दातव्यं यावद्वाऽत्र रसो भवेत् ॥
अत्रापि मुद्गया पाको निस्त्वचं निष्कुलीकृतम्॥८०॥” ]

इसको प्रतिदिन अपनी अग्निके बलानुसार सेवन करे और बकरीके गरम दूधका अनुपान करे । इसके सेवनसे रक्तपित्त, क्षतक्षय, खाँसी, श्वास, तमक, तृषा, ज्वर आदि रोगोंसे पीडित रोगी शीघ्र आरोग्य होता है । यह औषधि अत्यन्त वीर्य-वर्द्धक, शरीरको फिरसे नवीन करनेवाली, बल और वर्णको उत्पन्न करनेवाली, उरःसन्धानकारक, पौष्टिक और स्वरवर्द्धक है । इस कूष्माण्डखण्ड नामक उत्तम रसायनको अश्विनीकुमारोंने निर्माण किया है ॥८०

वासाकूष्माण्डखण्ड ।

पञ्चाशच्च पलं स्विन्नं कूष्माण्डात्प्रस्थमाज्यतः ।
ग्राह्यं पलशतं खण्डं वासाक्वाथाढके पचेत् ॥ ८१ ॥
मुस्ता धात्री शुभा भार्गी त्रिषुगन्धैश्च कार्षिकैः ।
ऐलेयविश्वधन्याकमरिचैश्च पलांशिकैः ॥ ८२ ॥
पिप्पलीकुडवं चैव मधुमानीं प्रदापयेत् ।
एतच्चूर्णीकृतं तत्र दर्व्या संघट्टयेत्पुनः ॥ ८३ ॥