भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४५३
लोहभस्म ४ तोले, बकरीका दूध १६ तोले, घी ८ तोले, मिश्री ४ तोले, शहद ४ तोले और वायविडङ्गका चूर्ण लोहभस्मसे चौथाई भाग लेवे। प्रथम ताँबेके एक उत्तम पात्रमें लोह भस्म, दूध, घी और मिश्री इनको एकत्रकर पकावे । जब पाक उत्तम प्रकारसे सिद्ध होजाय तब नीचे उतारकर उसमें वायविडङ्गका चूर्ण मिलादेवे और शीतल होजानेपर शहद डालकर घीके चिकने बासनमें भरकर रख- देवे । इसको प्रतिदिन एक एक मासेकी मात्रासे सेवन करने और ऊपरसे नारिय- लका जल पान करनेसे तीव्र अम्लपित्त, रक्तपित्त, क्षतक्षय आदि रोग दूर होते हैं। यह लोह-अत्यन्त पुष्टिकारक, कान्तिजनक, आयुकी वृद्धि करनेवाला और वृष्य- तम है ॥ ५६-५८ ॥
शतमूल्यादिलौह ।
शतमूलीसिताधान्यनागकेशरचन्दनैः ।
त्रिकत्रयतिलैर्युक्तं लोहं सर्वगदापहम् ॥
तृष्णादाहज्वरच्छर्दीरक्तपित्तहरं परम् ॥ ५९ ॥
शतावर, मिश्री, धनियाँ, नागकेशर, लाल चन्दन, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड, बहेडा, आमला, वायविडङ्ग नागरमोथा, चीतेके जडकी छाल और काले तिल इन सबका चूर्ण समान भाग और सब चूर्णकी बराबर लोहभस्म मिलाकर एकत्र खरल करके रखलेवे । उसको उचित मात्रासे नित्य शहदमें मिलाकर सेवन करे। इससे तृषा, दाह, ज्वर, वमन और रक्तपित्त दूर होता है ॥ ५९ ॥
शर्कराद्यलौह ।
शर्करातिलसंयुक्तं त्रिकत्रययुतं त्वयः ।
रक्तपित्तं निहन्त्याशु चाम्लपित्तहरं परम् ॥ ६० ॥
मिश्री, काले तिल, त्रिकुटा, त्रिफला और वायविडंङ्ग, नागरमोथा, चीता सब समान भाग ले सबको एकत्र मिलाकर सेवन करनेसे अम्लपित्त और रक्तपित्त शीघ्र नष्ट होता है ॥ ६० ॥
रक्तपित्तान्तकलोह ।
धात्री च पिप्पलीचूर्णं तुल्यं तु सितया सह ।
रक्तपित्तहरं लौहं योगराजमिति स्मृतम् ॥ ६१ ॥
वृष्याग्निदीपनं बल्यमम्लपित्तविनाशनम् ।
पित्तोत्थानपि वातोत्थान्निहन्ति विविधान् गदान् ॥ ६२ ॥