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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 483 of 1416

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Page 483

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४५१

अभ्रकभस्म, तीक्ष्ण लोहभस्म, सोनामाखीकी भस्म, शुद्ध पारा, शुद्ध हरताल और शुद्ध गन्धक इन सब‌को समान भाग लेकर मुलहठी, दाख और गिलोय इन प्रत्येकके क्वाथमें एक एक दिनतक खरल करे। फिर नित्यप्रति प्रातःकाल इसको एक एक मासे परिमाण मिश्री और शहदमें मिलाकर सेवन करे। इससे दुस्तर रक्तपित्त, ज्वर, दाह, क्षतक्षय, तृषा, शोथ और अरुचि आदि रोग दूर होते हैं ॥ ४६-४७ ॥

रसामृतरस ।

रसस्य द्विगुणं गन्धं माक्षिकं च शिलाजतु ।
गुडूची चन्दनं द्राक्षा मधुपुष्पं च धान्यकम् ॥ ४८ ॥
कुटजस्य त्वचं बीजं धातकी निम्बपत्रकम् ।
यष्टीमधुसमायुक्तं मधुशर्करयाऽन्वितम् ॥ ४९ ॥
विधिना मर्दयित्वा तु कर्षमात्रं तु भक्षयेत् ।
धारोष्णपयसा युक्तं प्रातरेव समुत्थितः ॥ ५० ॥
पित्तं तथाऽम्लपित्तं च रक्तपित्तं विशेषतः ।
निहन्ति सर्वदोषं च ज्वरं सर्वं न संशयः ॥
रसामृतरसो नाम गहनानन्दभाषितः ॥ ५१ ॥

शुद्ध पारा १ भाग, शुद्ध गन्धक २ भाग, सोनामाखीकी भस्म, शुद्ध शिलाजीत, गिलोय, लालचन्दन, दाख, महुएके फूल, धनियाँ, कुडेकी छाल, इन्द्रजौ, धायके फूल, नीमके पत्ते और मुलहठी—ये प्रत्येक एक एक भाग लेवे। सब औषधियोंको यथाविधि एकत्र कूट पीसकर बारीक चूर्ण करलेवे। इसमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एक तोला परिमाण लेकर शहद और मिश्री मिलाकर धारोष्ण दूधके साथ सेवन करे। इसको सेवन करनेसे पित्त, अम्लपित्त, विशेषकर रक्तपित्त, ज्वर और अन्यान्य सर्वप्रकारके विकार नष्ट होते हैं। इस रसामृतनामक रसको श्रीगहनानन्दजीने निर्माण किया है ॥४८-५१॥

सुधानिधिरस ।

सूतं गन्धं माक्षिकं लौहंचूर्णं सर्वं घृष्टं त्रैफलेनोदकेन ।
मूषामध्ये भूधरे तत्पुटित्वा दद्याद् गुंजां त्रैफलेनोदकेन ॥
लौहे पात्रे गोपयः पाचयित्वा रात्रौ दद्याद्रक्तपित्तप्रशान्त्यै ॥