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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 478 of 1416

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Page 478
४४६भैषज्यरत्नावली ।[ रक्तपित्त-

जलं खजूरमृद्वीकामधुकैः सपरूषकैः ।
शृतशीतं प्रयोक्तव्यं तर्पणार्थं सशर्करम् ॥ १८ ॥

ऊर्ध्वगत रक्तपित्तरोगमें खीलोंके चूर्णको घृत और शहदमें मिलाकर रोगीको खानेके लिये देवे अथवा छुहारा, दाख, मुलहठी और फालसे इनका षडंग पानीय विधिके अनुसार बनाया हुआ शीतल क्वाथ मिश्री मिलाकर पान करानेसे रक्तपित्तरोग शमन होता है ॥ १७ ॥ १८ ॥

त्रिवृता त्रिफला श्यामा पिप्पली शर्करा मधु ।
मोदकः सन्निपातोर्ध्वरक्तपित्तज्वरापहः ॥ १९ ॥

ऊर्ध्वगत रक्तपित्तमें यदि हो निसोत, त्रिफला, अनन्तमूल और पीपल इन सबका चूर्ण समान भाग और समस्त चूर्णसे दुगुनी खाँड एवं शहद मिलाकर लड्डू बनालेवे । इनके सेवनसे ऊर्ध्वगत रक्तपित्त और सन्निपात ज्वर दूर होता है ॥१९॥

शालपर्ण्यादिना सिद्धा पेया पूर्वमधोगते ।
वमनं मदनोन्मिश्रो मन्थः सक्षौद्रशर्करः ॥ २० ॥

अधोगत रक्तपित्तमें पहले शालपर्णी आदि स्वल्प पञ्चमूलके क्वाथमें सिद्ध की हुई पेया सेवन करावे । फिर वमनके लिये मैनफल, शहद और खांड मिलाहुआ मन्थ बनाकर देवे ॥ २० ॥

विना शुण्ठीं षडङ्गेन सिद्धं तोयं च दापयेत् ॥ २१ ॥

रक्तपित्तरोगीको ज्वराधिकारमें कहेहुए षडंग पानीयकी औषधियों ( नागरमोथा, पित्तपापडा, सुगन्धवाला, खस, सोंठ और लालचन्दन ) मेंसे सोंठको निकालकर अन्य ५ औषधियोंके द्वारा सिद्ध किया हुआ ठंडा क्वाथ पान करावे ॥ २१ ॥

आटरूषकनिर््यूहे प्रियंगुमृत्तिकाञ्जने ।
विनीय लोध्रं सक्षौद्रं रक्तपित्तहरं पिबेत् ॥ २२ ॥

अडूसेके क्वाथमें फूलप्रियंगु, मृत्तिका, अञ्जन, लोध्र और शहद डालकर पीनेसे रक्तपित्त दूर होता है ॥ २२ ॥

वासाकषायोत्पलमृत्प्रियङ्गुलोध्राञ्जनाम्भोरुहकेशराणि ।
पीत्वा सिताक्षौद्रयुतानिहन्यात्पित्तासृजोवेगमुदीर्णमाशु॥२३॥

अडूसेके क्वाथमें उत्पल ( नीलोफर ), गोपीचन्दन, फूलप्रियंगु, लोध्र, रसौंत और कमलकी केशर इनका समान भाग चूर्ण शहद और मिश्री मिलाकर पान करनेसे अत्यन्त वेगवान् रक्तपित्त शीघ्र नष्ट होता है ॥ २३ ॥