भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४५३
फ़स्त खुलवाना या जोंक लगवाना, धूमपान करना, वमनके वेगको रोकना, स्वेद देना, स्त्रीप्रसंग करना, सेमकी फली, पत्तोंवाले शाक, हींग, उडद, अधिक जलपान, तिलकुट, पान, सरसोंका तेल, मद्य, मिट्टीका खाना, दिनमें सोना, बहुत तीक्ष्ण, चरपरे और नमकवाले पदार्थ एव सह्यगिरि, और विन्ध्याचलसे निकलीहुई नदियोंका जल, सब प्रकारके खट्टे पदार्थ व खटाइयाँ, दूषित जल, स्वभाव और देश-कालविरुद्ध भोजन, पचनेमें भारी और दाहकारक पदार्थ ये सब पाण्डुरोगियोंको अहितकर हैं, अतः इनको त्याग देना चाहिये १३-१५ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां पांडु-कामला-हलीमकचिकित्सा ।
अथ रक्तपित्त-चिकित्सा ।
नोद्रिक्तमादौ संग्राह्यं बलिनोऽप्यस्रतश्च यत् ।
हृत्पाण्डुग्रहणीरोगप्लीहगुल्मज्वरादिकृत् ॥ १ ॥
रक्त-पित्तरोगमें रोगीके शरीरमें बल और भोजन करनेकी शक्ति रहतेहुए प्रथम प्रबल रक्तस्रावको रोकना नहीं चाहिये । कारण-शरीरमें दूषित रक्तके रुकजानेसे हृदयरोग, पाण्डु, संग्रहणी, प्लीहा (तिल्ली) गुल्म एवं ज्वरादि रोग उत्पन्न होजाते हैं ॥ १ ॥
ऊर्ध्वं प्रवृत्तदोषस्य पूर्वं लोहितपित्तिनः ।
अक्षीणबलमांसाग्नेः कर्त्तव्यमनतर्पणम् ॥ २ ॥
ऊर्ध्वमार्गगत रक्तपित्तमें-रोगीके बल और मांसके क्षीण न होनेपर एवं अग्निके प्रदीप्त होनेपर पहले उसको लंघन कराने चाहिये ॥ २ ॥
ऊर्ध्वगे तर्पणं पूर्वं कर्त्तव्यं च विरेचनम् ।
प्रागधोगमने पेया वमनं च यथाबलम् ॥ ३ ॥
ऊर्ध्वगत रक्तपित्तरोगमें-पहले तृप्तिजनक क्रियायें और फिर विरेचन देना चाहिये । एवं अधोगत रक्तपित्तमें प्रथम भोजनके विषे पेया देवे, फिर उसके बलानुसार वमन कराकर दोषोंको दूर करे ॥ ३ ॥
शालिषष्टिकनीवारकोरदूषप्रशांतिकाः ।
श्यामाकश्च प्रियङ्गुश्च भोजनं रक्तपित्तिनाम् ॥ ४ ॥