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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

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Page 462

४३० भैषज्यरत्नावली । [ पाण्डु-आदि -


पकावे। जब पककर लोहेकी समान गाढा होजाय, तब एक एक तोलेकी गोलियाँ बनाकर इनमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक गोली खानेसे कामला और पाण्डुरोग शीघ्र दूर होते हैं ॥ २८-२९ ॥

दार्व्यादिलौह ।

दार्वीसत्रिफलाव्योषविडङ्गानन्यसो रजः ।
मधुसर्पिर्युतं लिह्यात् कामलापाण्डुरोगवान् ॥ ३० ॥

दारुहल्दी, त्रिफला, त्रिकुटा और वायविडङ्ग इन सबके चूर्णको समान भाग और सब चूर्णके बराबर लोहभस्म लेकर सबको एकत्र शहद और घृतके साथ मिलाकर प्रतिदिन सेवन करनेसे कामला और पांडुरोगी स्वास्थ्यलाभ करते हैं॥३०॥

त्रिकत्रयाद्यलौह ।

पलं लौहस्य किट्टस्य पलं गव्यस्य सर्पिषः ।
सितायाश्च पलं चैकं मधुनश्च पलं तथा ॥ ३१ ॥
तोलैकं कान्तलौहस्य त्रिकत्रयसमन्वितम् ।
ततः पात्रे विधातव्यं लौहे वा मृन्मये तथा ॥ ३२ ॥
भावितं मधुसर्पिर्भ्यां रौद्रे शिशिर एव च ।
भोजनादौ तथा मध्ये चान्ते चैव प्रयोजयेत् ॥ ३३ ॥
कामलां पाण्डुरोगं च हलीमकंमथापि च ।
अम्लपित्तं तथा शूलं शूलं च परिणामजम् ॥ ३४ ॥
कासं पञ्चविधं चैव प्लीहश्वासज्वरानपि ।
अपस्मारं तथोन्मादमुदरं गुल्ममेव च ॥ ३५ ॥
अग्निमान्द्यमजीर्णं च श्वयथुं च सुदारुणम् ।
निहन्ति नात्र सन्देहो भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ३६ ॥

मण्डूर (लोहेका मैल) ४ तोले, गौका घी ४ तोले मिश्री ४ तोले, शहद ४ तोले, कान्तलोहका चूर्ण १ तोला, एवं त्रिकुटा, त्रिफला, चीतेकी जड, नागरमोथा और वायविडंग इन सबका चूर्ण एक एक तोला लेवे। फिर इन औषधियोंको एकत्र लोहेके पात्र अथवा मिट्टोके पात्रमें करके दिनको धूपमें और रातको ओसमें तीनदिन तक शहद और घृतकी भावना देवे। इसको भोजनके पहले, मध्यमें और अन्तमें सेवन करनेसे यह त्रिकत्रयाद्यलौह कामला,